भारत का संविधान

"हम भारतवासी,गंभीरतापूर्वक यह निश्चय करके कि भारत को सार्वभौमिक,लोकतांत्रिक गणतंत्र बनाना है तथा अपने नागरिकों के लिए------- न्याय--सामाजिक,आर्थिक,तथा राजनैतिक ; स्वतन्त्रता--विचार,अभिव्यक्ति,विश्वास,आस्था,पूजा पद्दति अपनाने की; समानता--स्थिति व अवसर की व इसको सबमें बढ़ाने की; बंधुत्व--व्यक्ति की गरिमा एवं देश की एकता का आश्वासन देने वाला ; सुरक्षित करने के उद्देश्य से आज २६ नवम्बर १९४९ को संविधान-सभा में,इस संविधान को अंगीकृत ,पारित तथा स्वयम को प्रदत्त करते हैं ।"

Visitors

मैं भूत बोल रहा हूँ........!!

सोमवार, 24 नवंबर 2008


मैं भूत बोल रहा हूँ !!
मेरी गुजरी हुई जिन्दगी के प्यारे-प्यारे दोस्तों,अब बड़ा प्यार उमड़ता है आपलोगों के ऊपर!!जबकि जब तक मैं जिन्दा था,आपसबों से झगड़ता ही रहता था!!मैं और मेरे जैसे अनेक लोग अक्सर ऐसी-ऐसी बातों पर झगड़ते थे कि आज जब मई उन बातों को सोचता हूँ,तो ख़ुद पर बड़ा आश्चर्य होता है,कि उफ़ हाय मैं ऐसा था?यदि मैं ऐसा था तो जीते-जी मुझे इस बात कि अक्ल क्यूँ नहीं आई ,आदमी होते हुए मुझमें आदमियों जैसा विवेक क्यों नहीं जागृत हुआ?मै मूर्खों कि तरह क्यूँ सबसे व्यवहार करता रहा?यदि मुझमे इतनी ही अक्ल थी ,तो मैंने अगली बार अपनी गलतियों को क्यूँ नहीं सुधारा?और हरेक बार फिर-फिर से वही-वही गलतियाँ कैसे करता रहा ?कैसे मैं हर वक्त दोहरा और पाखंडपूर्ण जीवन जीता रहा?क्यों मेरे दोस्त खासतौर पर मेरी ही जात या धर्म के या फिर कुछेक मेरे नजदीकी भर ही रहे?गैर धर्म के लोगों को मैं काले चश्मे से क्यूँ देखता रहा?किसी गैर धर्म के लोगों में मैं अपने आप को क्यूँ समेट लेता था?उनसे कटा-कटा क्यूँ रहता था?मैं सदा यह क्यूँ सोचता था कि चित्रों में दिखने वाले मेरे भगवान् ही बेस्ट हैं,और इस बात पर मैं उनसे झगड़ता भी रहता था!!भगवान के नाम पर मैनें इतने काले कारनामे किए कि जिनके उदाहरण देने लगूं,तो फिर से एक जन्म लेना पड़ जाएगा !!अनमोल रत्न-जडित ,विराट आभामंडल से दीप्त अत्यन्त ख़ूबसूरत से दिखाई देते मेरे भगवान मुझे वाकई आकर्षित करते थे,मगर मैनें अपने अंधेपन में यह कभी नहीं सोचा कि ठीक है मेरे भगवान तो सुंदर हैं मगर इसमें उन विजातीय खुदाओं का क्या कसूर?फिर यह भी कि मेरे भगवान मेरे घर में हैं,तो उनके खुदा भी उनके घर में होंगे!!जब मुझे उनसे कोई मतलब ही नहीं है,तो मै उनके खुदा को लेकर क्यों परेशां हूँ?ये तो वही बात हुई कि मान न मान मैं तेरा मेहमान !! अरे भाई जब तुम अपने घर में जी रहे हो तो दूसरों को भी उनके घर में जीने दो न!!अपने घर में तुम क्या पका रहे हो ,जब यह किसी को पता नहीं लगने देना चाहते ,तो दूसरों के घर में क्यूँ टांक-झाँक करते हो?एक तरफ़ सभ्यता का पाठ पढ़ते हो,दूसरी और बिना उनकी इजाजत के क्यूँ उनका मन-परिवर्तन करना चाहते हो?कोई और किसे पूजता है,इससे तुम्हारे बाप का क्या बन या बिगड़ जाएगा?तुम अपने घर में घी-चुपडी रोटी खा रहे हो ,और जिसे सूखी रोटी भी नसीब में नहीं है क्या उन्हें तुम्हारा बाप रोटी दे रहा है?.........महाराष्ट्र में एक समय शिवाजी महाराज का राज्य था,एक बार उनके गुरु महाराज उनकी राजधानी में पधारे,तो छत्रपति शिवाजी महाराज ने उन्हें बताया कि उनके राज्य में सब खुशहाल हैं,सबको राज्य के अधिकारी रोटी,कपड़ा,घर और ज़रूरत की तमाम वस्तुएं उपलब्ध करवा रहे हैं,चारों और शान्ति और स्म्रिद्दी का राज है!गरु महाराज बड़े संतुष्ट हुए,मगर वे तत्क्षण ही ताड़ गए कि ये शिवाजी का अंहकार बोल रहा है,शिवाजी को वे एक चट्टान के पास ले गए और कहा कि ज़रा इसे तूद्वाएं ,शिवाजी बड़े चकित हुए कि गुरु ऐसा क्यूँ करवा रहे हैं ,मगर गुरु की आगया थी सो उन्होंने शिला को तोड़ने का आदेश दिया,तो जैसे ही शिला टूटी ,उसमे से कुछ छोटे-छोटे कीडे बाहर निकले!!गुरु ने पुछा कि इनको भोजन कौन दे रहा है?गुरु कि बात का मर्म समझते ही शिवाजी शर्म से पानी-पानी हो गए,और गुरु-चरणों में गिर पड़े!!सार ये है कि हम दरअसल किसी को कुछ नहीं देते,तो हमें क्या हक़ बन पड़ता है कि किसी जिंदगी में अँधेरा बिखेरें या उसका जीवन ही छीन लें?अपने अनमोल जीवन को हम किन बातों के झगडे में व्यर्थ करतें हैं,हम अक्सर बदतमीजी से भरे हुए ही क्यूँ रहते हैं,अपने सही होने के सिवा हमें हर कोई ग़लत ही क्यूँ प्रतीत होता है?हम हर वक्त दूसरों पर हावी क्यूँ होना चाहते हैं?हम अपने जैसे अपनी मर्जी से किसी को क्यूँ नहीं रहने देना चाहते ?हम क्यूँ किसी को अपनी बराबरी में नहीं देखना चाहते?यह भी एक बहुत बड़ी विसंगति है,कि एक और तो हम दूसरों को अपने बराबर नहीं देख सकते,और दूसरी तरफ़ गरीब लोगों के साथ उठने-बैठने में भी अपनी तौहीन समझते हैं,यहाँ तक कि अपने गरीब रिश्तेदारों को भी नहीं पहचानते !!हम वाकई बड़े अद्भुत जीव हैं!हम जो चाहते हैं उससे ठीक उल्टा ही चलते हैं!!चाहते हैं प्यार मगर करते हैं नफरत!!दूसरों से चाहते हैं इमानदारी ,मगर ख़ुद हर वक्त करते हैं बेईमानी !!आदमी की दुनिया के मानदंड बड़े ही विचित्र हैं !!मगर मैं जो भी कुछ सोच रहा था वो अब बिल्कुल फिजूल था,क्योंकि मैं तो अब मर ही चुका था और किसी को अब कुछ भी कह नहीं सकता था,कहता भी तो बजाय कुछ समझने के कोई भी बंद बुरी तरह डर ही जाता !
तो इस तरह मैं एक फिजूल की जिंदगी धरती पर गुजारकर आ गया!!आज अफ़सोस कर रहा हूँ!!मैं ये आप सबों को इसलिए बता रहा हूँ कि आप भी मेरी तरह कीडे-मकोडे-सी जिंदगी गुजर कर न आ जायें,बल्कि अपनी बाकी की जिंदगी को एक नया रंग दे .....उसमे उल्लास भर दे....उसमे अथाह प्यार भर दे...बच्चा हो या कोई बड़ा,आपके पास आए तो यह महसूस करे कि वो किसी आदमी के पास ही आया ...!!आदमी होना एक बड़ी अद्भुत बात है हम वाकई आदमी की तरह ही जीकर जिन्दगी गुजार दे यह भी हमारे लिए एक अद्भुत बात ही होगी!!......कहा भी है न कि आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसान होना......आज मैं बेशक एक भूत हो गया हूँ,लेकिन आपका साथ ही देना चाहता हूँ ......मगर आपके लिए तो फिलहाल इतना ही बहुत है कि आप सचमुच एक इंसान बनकर दूस्ररे की तरफ़ मोहब्बत का हाथ बढायें....आज बस इतना ही .....सबको भूतों का प्यार.......!!!
Share this article on :

3 टिप्‍पणियां:

नीरज गोस्वामी ने कहा…

"सार ये है कि हम दरअसल किसी को कुछ नहीं देते,तो हमें क्या हक़ बन पड़ता है कि किसी जिंदगी में अँधेरा बिखेरें या उसका जीवन ही छीन लें?अपने अनमोल जीवन को हम किन बातों के झगडे में व्यर्थ करतें हैं,हम अक्सर बदतमीजी से भरे हुए ही क्यूँ रहते हैं,अपने सही होने के सिवा हमें हर कोई ग़लत ही क्यूँ प्रतीत होता है?हम हर वक्त दूसरों पर हावी क्यूँ होना चाहते हैं?हम अपने जैसे अपनी मर्जी से किसी को क्यूँ नहीं रहने देना चाहते"

वाह...बहुत पते की बात कही है आपने...इन प्रश्नों का सही उत्तर हमारे जीवन को खुशहाल बना सकता है...
नीरज

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत बढिया लिखा है।आभार।

Mired Mirage ने कहा…

अद्भुत (अद्+ भुत, भूत भी हो सकता था,यदि कमजोर वर्तनी होती । ) भुतहा ज्ञान से भरा लेख ! ऐसा भूत में तो न पढ़ा है,न देखा है ।
बहुत बढ़िया लिखा है । विचारणीय,अनुकरणीय लेख! यदि आपकी सलाह मान लेंगे तो भूत बनकर भी ब्लॉगिंग न करनी पड़ेगी और निश्चिन्त हो ब्ह्माण्ड का मुफ्त भ्रमण कर सकेगें ।
आपके विचार जानकर बहुत अच्छा लगा । खुशी है कि मैंने यह लेख पढ़ा । सराहनीय लेखन!
घुघूती बासूती

 
© Copyright 2010-2011 बात पुरानी है !! All Rights Reserved.
Template Design by Sakshatkar.com | Published by Sakshatkartv.com | Powered by Sakshatkar.com.