भारत का संविधान

"हम भारतवासी,गंभीरतापूर्वक यह निश्चय करके कि भारत को सार्वभौमिक,लोकतांत्रिक गणतंत्र बनाना है तथा अपने नागरिकों के लिए------- न्याय--सामाजिक,आर्थिक,तथा राजनैतिक ; स्वतन्त्रता--विचार,अभिव्यक्ति,विश्वास,आस्था,पूजा पद्दति अपनाने की; समानता--स्थिति व अवसर की व इसको सबमें बढ़ाने की; बंधुत्व--व्यक्ति की गरिमा एवं देश की एकता का आश्वासन देने वाला ; सुरक्षित करने के उद्देश्य से आज २६ नवम्बर १९४९ को संविधान-सभा में,इस संविधान को अंगीकृत ,पारित तथा स्वयम को प्रदत्त करते हैं ।"

Visitors

मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

तो फिर कह दो कि ईश्वर नहीं है....नहीं है.....नहीं है....!!

मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!
   बहुत दिनों से दुनिया के तरह-तरह के धर्मग्रंथों-दर्शनशास्त्रों,धर्मों की उत्पत्ति-उनका विकास और भांति-भांति के लोगों द्वारा उनकी भांति-भांति प्रकार की की गयी व्याख्यायों को पढने-समझने-अनुभव करने की चेष्टा किये जा रहा हूँ,आत्मा-ईश्वर-ब्रह्माण्ड,इनका होना-ना होना,अनुमान-तथ्य-रहस्य-तर्क, तरह-तरह के वाद-संवाद और अन्य तरह-तरह विश्लेषण-आक्षेप तथा व्यक्ति-विशेष या समूह द्वारा अपने मत या धर्म को फैलाने हेतु और तत्कालीन शासकों-प्रशासकों द्वारा उसे दबाने-कुचलने हेतु किये गए झगडे-युद्द यह सब पता नहीं क्यों समझने-समझाने से ज्यादा मर्माहत करते हैं,मगर किसी भी प्रकार एक विवेकशील व्यक्ति को ये तर्क मनुष्य के जीवन में उसके द्वारा रचे गए अपने उस धर्म-विशेष को मानने की ही जिद का औचित्य सिद्द करते नहीं प्रतीत होते !! 
          धर्म की महत्ता अगरचे मान भी लें तो किसी एक वाद या धर्म के प्रचार-प्रसार हेतु किये गए,किये जा रहे युद्दों का भी औचित्य समझ से परे लगता है,अगर यही है धर्म, तो धर्म हो ही क्यों ??     
           धरती पर तरह-तरह के मनुष्यों द्वारा तरह-तरह का जीवन बिठाये जाने के आधार पर पूर्वजन्मों के औचित्य....किसी नालायक का ऐश-विलास-भोग आदि देखकर या किसी लायक का कातर-लोमहर्षक जीवन देखकर कर्म-फल-श्रृंखला और कर्मफलों का औचित्य.....सिद्द किया जाता है !! यानी कि जो कुछ हमें तर्कातीत प्रतीत होता है,उसे हम रहस्यवादी बातों द्वारा उचित करार दे दिया करते हैं और मुझे यह भी अजीब लगता है कि कोई वहशी-हरामखोर-लालची-फरेबी-मक्कार-दुष्ट व्यक्ति,जो करोड़ों-अरबों में खेलता हुआ दिखाई देता है,या जो तमाम आस्था-श्रद्धा और विवेकवान होने के बावजूद फाकामस्ती-तंगहाली में एकदम फटेहाल जीवन जीने को अभिशप्त है,तिस पर भी अन्य तरह-तरह की आपदाएं....इन सबमें साम्य क्या क्या है ...??कर्म-फल...!!??
           इस तरह के प्रश्न विवेकवानों द्वारा पूछे जाते हैं कि समाज में इतनी घोर अनैतिकता क्यों है ??क्यों कोई इतना गरीब है कि खाने के अभाव में, छत के अभाव में,दवाई के अभाव में,या कपड़ों के अभाव में ठण्ड से या लू से या बाढ़ से मर जाता है ??तरह-तरह की आपदाओं और बीमारियों से जूझने,उस दरमियान संचित धन के ख़त्म हो जाने और उसके बावजूद पीड़ित के मर जाने और उसके बीवी-बाल-बच्चों के एकदम से सड़क पर आ जाने की घटनाएं भी रोज देखने को मिलती हैं !!....फिर भी ईश्वर है ! और यह सब होना हमारे की कर्मों का फल !!
         मगर दरअसल इस प्रश्न को ठीक पलट कर पुछा जाना चाहिए (ईश्वर है-नहीं है के तर्कों को परे धर दीजिये) कि कोई बेहद धनवान है और हम यह भी जानते हैं कि यह धन उसने येन-केन-प्रकारेण या किस प्रकार पैदा या संचित किया है,या हडपा है या सीधे-सीधे ना जाने कितनों के पेट पर लात मारकर कमाया है !!(या हरामखोरी की है!!)और वो इतना क्रूर है कि उस-सबके बावजूद...अपने समाज में व्याप्त इस असमानता के बावजूद (जिसका एक जिम्मेवार वो खुद भी है !!) वो अपने संचित धन के वहशी खेल में निमग्न रहता है...अगर ईश्वर है, तो उसके भीतर भी क्यों नहीं है और अगर उसके भीतर नहीं है तो फिर हम यह क्यों ना मान लें कि ईश्वर नहीं ही है !!??
           अगर ईश्वर है तो सबमें होगा,होना चाहिए !! अगर ईश्वर है तो मानवता इतनी-ऐसी पीड़ित नहीं होनी चाहिए !! अगर ईश्वर है तो कर्मफल का बंटवारा भी वाजिब होना चाहिए !!.....मगर जो फल हम आज भोग रहें हैं,वो तो हमारे किसी अन्य जन्मों का सु-फल या कु-फल हैं ना....!! तो बस इसी एक बात से तो ईश्वर होने की बात,उसके होने की उपादेयता भी साबित हो जाती है !!
           इस तरह की बातों पर माथा-फोड़ी करने के बजाय अगर हम इस बात पर विचार कर पायें,तो क्या यह बेहतर नहीं होगा कि हम अगर खुशहाल हैं और हमारे पास इतना अधिक धन है कि ना जाने हमारी कितनी पीढियां उसे खाएं....फिर भी हमारे ही आस-पास कोई भूख से-ठण्ड से-दवाईयों के अभाव में या छत के अभाव में मर जाए,तो ऐसा क्यों है,अगर हमारे खुद के भीतर ईश्वर नहीं है तो फिर क्यूँ ना हम यह कह दें कि ईश्वर नहीं है,क्योंकि अगर वो है,तो या तो हमारे होने पर थू-थू है और हम गलीच हैं या हममे मौजूद ऐसे लोगों की क्रूरता धन्य है,जो दिन-रात पत्र-पत्रिकाओं और अन्य मीडिया द्वारा चिल्लाए जाते रहने के बावजूद किसी बात पर नहीं पसीजते और पसीजेंगे भी क्यों, क्योंकि वो तो जिस पत्थर के बने हुए हैं उसी के कारण तो शोषण-अत्याचार की सहायता से तरह-तरह ठगई द्वारा यह सब करते हैं,धन कमाने के लिया ह्त्या तक भी करते-करवाते हैं !! अगर फिर भी ईश्वर है तो होगा किसी की बला से !!
           आदमी में व्याप्त तरह-तरह की सदभावनाओं दया-भावों के बावजूद अगर कुछ लोग इन सब बातों से अछूते रहकर सिर्फ-व्-सिर्फ धन कमाने को ही अपना लक्ष्य बनाए धन खाते-पीते-पहनते-ओढ़ते आखिरकार मर जाते हैं और उनको जलाकर दफनाकर कब्रिस्तान-श्मशान में ऊची-ऊंची आध्यात्मिक बातें करने के बावजूद हम घर लौटकर वही सब करने में मशरूफ हो जाते हैं तो फिर भला ईश्वर कैसे है ??
            हमारे होने के बावजूद यदि सब कुछ ऐसा है और ऐसा ही चलता रहने को है तो फिर सच कहता हूँ कि हम सब धरती-वासियों को एक साथ खड़े होकर जोर की चीत्कार लगानी चाहिए कि तो फिर कह दो कि ईश्वर नहीं है....नहीं है.....नहीं है....!!
--
http://baatpuraanihai.blogspot.com/

रविवार, 11 दिसंबर 2011

माननीय सम्पादक महोदय,

मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!
माननीय सम्पादक महोदय,
       आज सवेरे प्रभात खबर का सम्पादकीय पढ़ा,और तब से कुछ प्रश्नों से जूझ रहा हूँ,आपने लिखा "......यह एक तथ्य है कि भीड़ की ताकत संख्या होती है,विवेक नहीं. संसद के विवेक में देश के हर हिस्से से आये हुए जन-प्रतिनिधियों का (सामूहिक)विवेक शामिल होता है.जंतर-मंतर या किसी दूसरी जगह पर जुटी भीड़ का इस्तेमाल सांसदों के सामूहिक विवेक पर दबाव बनाने के लिए तो किया जा सकता है,फैसला लेने या फैसला सुनाने के लिए नहीं  "         
माननीय महोदय,ऐसा लगता है कि ऐसी बातें कतिपय माननीयों का अहम् कायम करने के लिए की जाती हैं.हमारी समझ से तो जनता अपने प्रशासनिक कार्यों की पूर्ति के लिए इन प्रतिनिधियों को संसद या विधान सभाओं में भेजती है,कारण कि इन जगहों पर चूँकि हजारों-लाखों की संख्या में लोग समा नहीं सकते,दूसरा ऐसा करने से एक दूसरी ही अव्यवस्था पैदा हो सकती है इसलिए ऐसा मान कर कि हम जिन्हें इन संवैधानिक जगहों पर भेज रहें हैं,वहां जाकर ये अपने कर्तव्यों का अनुपालन करते हुए हमें समुचित व्यवस्था,सुरक्षा और सु-शासन प्रदान करेंगे,ऐसा विवेक हमारे भीतर होता है मगर जिस सामूहिक विवेक की बात आप कर रहे हो,वह बहुत सारे जन-प्रतिनिधियों के किसी भी प्रकार के आचरण और चरित्र में कभी दिखाई नहीं पड़ता,तात्पर्य यह कि चुने जाने के पश्चात ये अपने लालच के कारण महज अपने स्वार्थों को पूरा करने के अलावा हमसे किये गए वायदों और उन सारी बातों या कर्तव्यों से मुकर गए और ऐसा भी जान पड़ता है कि वो आगे भी ऐसा ही करते रहने वालें हैं और जब जन-प्रतिनिधियों के भ्रष्ट होने की बात की जाती है,तो इशारा साफ़-साफ़ इन्हीं लोगों की और होता है....स्पष्टतया तो अपने आचरण और चरित्र से वे इन जगहों को कलंकित कर रहे होते हैं,जहां होकर देश का मान और जनता "दाम" बढ़ाना चाहिए !!
       किन्तु माननीय सम्पादक हम देखते है कि आप और आप जैसे कतिपय सम्पादक अपने आलेखों में चीख-चीख इन आचरणों और चरित्र पर आवाज़ उठाते हो मगर इनके कानों पर जूं नहीं रेंगती...आप सबों की पहल पर ये जेल जाते हैं,वहां भी ये गुलछर्रे ही उड़ाते हैं और कुछ दिनों बाद जमानत पर छूट जाते हैं,तो जब देश के या लोकतंत्र चौथे खम्बे के नाम से संवैधानिक दर्जे से सुशोभित इस मंच की आवाज़ का यह हाल है,तो आप सब ज़रा सोचिये कि आम जनता किन हालातों में जीती है और मजा यह कि कल तक अपने बीच में रह रहे किसी आम से सज्जन को अपना सेवक बनने के लिए भेजा जाकर भी अपने को छला हुआ पाती है तो उसके दिल पर क्या गुजरती होगी ?! यह बिलकुल वैसा ही है कि आपने तो तमाम गुण-रूप और आचरण देखकर शादी की मगर शादी होते ही आपका जीवन साथी किसी और के संग रंगरेलियां मनाने लगा...!!    
      और माननीय सम्पादक साहब, तमाम ऐसे प्रतिनिधियों के मानवता को शर्मसार कर देने वाले गंदले चरित्र से या अपने आचरण से दुनिया भर में भारत का मान/भाल नीचा कर देने वाले समस्त-"सु_कर्मों" के बावजूद भी आज तक अपनी संसद या कोई भी विधानसभा कलंकित नहीं हुई नहीं मगर उनके इस चरित्र पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाते ही ये संस्थाएं यकायक कलंकित हो जाया करती है...!! तो क्या जनता इतनी बेगैरत है कि उसके द्वारा किसी वाजिब सवाल को समुचित-सुसंगत तर्कों के साथ उठाये जाने के बावजूद आप उसे लांछित कर दो...??क्या यह भी किन्हीं ताकतवर लोगों का अहम् नहीं है,जो किन्हीं दुसरे ताकतवर लोगों के पक्ष में जा ठहरता है...?? 
         और माननीय सम्पादक साहब,जनता अपनी किस सीमा तक रहे यह तय करने से पहले यह तो तय कर लो कि हमारे भ्रष्ट जन-प्रतिनिधियों और 
उनकी चांडाल-चौकड़ी अपनी किस सीमा तक रहे....मगर इससे पूर्व एक बुनियादी बात यह कि हमने उन्हें वहां चांडाल-चौकड़ी का निर्माण करने हेतु नहीं बल्कि हमारे खुद के लिए सुशासन करने हेतु भेजा है....!!और वो हमारे ही भ्रष्ट राजा बन बैठे हैं....!!यह तो वही बात हुई कि मेरी बिल्ली और मुझी से म्याऊँ...!!....जनता भी विवेकशील ही होती है...अगर ऐसा नहीं है तो विवेकहीनता का तात्पर्य क्या यह भी तो नहीं है कि उसने अपने लिए गलत प्रतिनिधि चुन लिए हैं...??अगर ऐसा है तब तो उन्हें गद्दी से उतारना बनता है....बनता है ना...!!
        मतलब जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनने तक की सीमा तक तो सही या विवेकशील है...उसके बाद उसका यह गुण समाप्त हो जाता है,यही ना...??मतलब यह भी कि एक चुन लिए जाने के बाद जिसे जो चाहे करता रहे और जनता भाड़ में जाए जनता की बला से...!!इसका मतलब यह भी तो है कि जनता के बीच से उठकर जनता के लिए आवाज़ उठाने वाले सारे संविधान-विज्ञ और अन्य सम्मानित लोग चूँकि किसी रूप में संवैधानिक नहीं हैं,इसलिए उन्हें संविधान और संसद का अपमान करने का दोषी ठहराया जा सकता है,और उनपर तमाम गलत-सलत सलत लांछन लगाकर जनता को बरगलाया जाना बिलकुल संवैधानिक है...वाजिब है ??
     तो फिर सम्पादक साहब हम जनता यह आज से सबको यह बताना चाहते हैं कि इस देश के जन्मजात नागरिक होने के कारण सबसे पहले हम संवैधानिक हैं....उसके बाद कोई और...और संविधान में सचमुच अगर हमारे लिए कोई जगह है तो कोई भी संविधान के नाम पर अब ज्यादा दिनों तक हमें भरमाये रख "कुशासन" नहीं लाद सकता....हम भी संविधान के रक्षक हैं....और उसका भक्षण करने वालों को हटाने की कारवाई शुरू कर चुके हैं....जय हिंद....!!
--
http://baatpuraanihai.blogspot.com/

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

लोकतंत्र...!! हा...हा...हा...हा....क्यूँ मजाक करते हैं साहब !!

मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!



लोकतंत्र...!! हा...हा...हा...हा....क्यूँ मजाक करते हैं साहब !!

          जब से सामाजिक मुद्दों पर सोचना-लिखना शुरू किया,या यूँ कहिये कि जबसे समाज के बारे समझने की उम्र हुई,तब से एक मुद्दा सदैव ज्वलंत मुद्दा बना रहा है मन में,वो यह है,भारत के लोग,उसकी समस्याएं,भारत का लोकतंत्र,लोकतंत्र के कारण पैदा हुई समस्याएँ और लोगों की मनोवृति के कारण लोकतंत्र में पैदा हो रही समस्याएं !!
         भारत के अ-शिक्षित,अर्द्धसाक्षर लोकतंत्र में जो तरह-तरह की विचित्रताएं हैं,उसके कारण इसे लोकतंत्र की संज्ञा देना वैसे तो लोकतंत्र शब्द की अवज्ञा है मगर अब जब यह मान ही लिया गया है कि भारत में लोकतंत्र ही है,तो मानना ही पडेगा !!मगर सच्चाई तो यह है कि भारत के शासकों की प्रवृति सदा से शाश्वतरूपेण राजशाही की ही रही है और आज भी है और लोकतंत्र की तमाम संस्थाओं का ताना-बाना भी राजशाही भरा ही है और बजाय किसी आम सहमति के तमाम जगहों पर संस्थाओं में जायज या नाजायज ढंग से काबिज लोगों के काबिल या नाकाबिल वंशज ही मनोनीत कर दिए जाते हैं और ना सिर्फ आम जनता बल्कि संस्था के कार्यकर्ता भी उस व्यक्ति को पूजते रहते हैं,जिसे दरअसल कुछ विवेकवान लोगों या संस्थाओं द्वारा चोरी-छिपे या सरे-आम गरियाया भी जाता रहता है !!
          भारत का लोकतंत्र दरअसल यहाँ के हरेक आम या ख़ास की एक ऐसी बपौती है,जिसकी कि कोई परिभाषा नहीं हैं मगर जिसके लिए जो जो भी कह रहा है वो सही है,जो भी कर रहा है वो भी सही है और हर एक कोई इतना सही है कि दूसरे को गलत साबित करने के लिए वो किसी भी तरह की हिंसा की सारी हदें पार करने तक को तैयार है और दरअसल यहीं से इस लोकतंत्र की विचित्रताएं प्रारम्भ होती हैं,जो विचित्रताओं से ज्यादा भयानक हैं, वीभत्स हैं,क्रूर हैं !!जिसे कतई लोक का तंत्र नहीं कहा जाना चाहिए मगर इसे महान की संज्ञा जो देनी ठहरी,इसलिए इसे विश्व का विशालतम लोकतंत्र कहा जाता है,मगर मेरे जैसों के लिए यह सदा से कौतूहल का विषय बना हुआ है वो भी इतना ज्यादा कि इस पर कोई ग्रन्थ ही लिख मारूं मगर लिखने बोलने और सत्संग करने से अगर लोग बदल जाया करते तो ऋषियों-महर्षियों की जितनी बड़ी फ़ौज भारत नाम के इस देश में हो चुकी और उससे भी कई गुनी आज के दौर में हुई और फली-फूली जा रही है,भारत कब का स्वर्ग बन चुका होता,होना चाहिए था...मगर सारे नामी-गिरामी स्वर्गवासी हो चुके,हुए जा रहें हैं,भारत का कुछ बनता ना बिगड़ता है,निजी उपलब्धियों को भले आप कुछ भी नाम दे दो,उससे भारत की अधिसंख्य जनता का एक धेला भी नहीं कुछ होता !!
          यह बड़ा विचित्र नहीं है कि आप किसी देश को प्रेम तो करते होंओं मगर उस प्रेम की एक भी शर्त पूरी नहीं करते सिवाय एक यहाँ पैदा होने के और मजा यह कि उस पर आपका कोई हक़ ना था !!
अगर आप किसी भी देश में पैदा होने को लेकर अगर उसका गुणगान करते हो,या फिर उसकी निंदा या आलोचना जो भी करते हो,मगर दरअसल आप उसके हक़ या बेहतरी के लिए क्या करते हो?कुछ करते भी हो या नहीं !!अजीब हाल है यहाँ का एक रात को तो सब चोरी करते हैं और सुबह से शाम तक सब चिल्लाते हैं कि चोर-आया-चोर आया !!और चोर कौन है यह पता ही नहीं चलता....और अगर पता चल भी पाता है तो उसमें भी बरसों अदालती कार्यवाहियों के बाद ससम्मान छूट जाते हैं,क़ानून को धत्ता बताकर....और गलती से किसी को दंड मिल भी जाए तो इसे भारत की समझ लीजिये !!
         हम भारतीयों में बहुतेरे तो अकर्मण्य हैं,काहिल हैं और रही सही कसर कुछ सरकारी योजनायें पूरी कर देती हैं हमें और अधिक अकर्मण्य बना डालने के लिए ! मगर तुर्रा यह कि हम यह मानते भी नहीं और अगर हमें कोई काहिल कह भी दे तो फिर देखिये कि क्या होता है...! अनपढ़ लोग तो जाहिल-गंवार कहे जाते हैं,मगर पढ़े-लिखों का आचरण देखकर भी ऐसा नहीं लगता कि किसी भी सूरत में उनसे कमतर कहे जाने योग्य हैं,मगर मित्रों,अनपढ़ तो अनपढ़ है ही ,आपने भी पढ़-लिखकर कौन सा बड़ा तीर मार लिया...अगर आपका आचरण भी ऐसा ही है तो आप तो उससे भी गए-बीते हुए ना ?मगर कोई आपको ऐसा कहकर तो देखे !! मगर तमाम अ-संस्कार.कु-संस्कार, अ-लोकतांत्रिक, अ-सामाजिक और सभी तरह के सामाजिक कर्तव्यों से च्यूत रहकर भी आप अहंकार की भाषा का उपयोग करें,यह लाजिमी तो नहीं लगता मगर सवाल तो यह है कि यह आपको बतलाये-समझाए कौन ?
         आखिरी बात यह है अगर कोई बेहतर ना कर पाए तो शायद चल भी सकता है,मगर इसके ठीक उलट बुरा किया जाए तो इसका परिणाम भी निश्चित रूप से बुरा ही होगा,होगा ना...??तो भारत में दरअसल यही होता आ रहा है,हम सब अपनी-अपनी जगह पर अपनी-अपनी औकात के अनुसार भारत को लूट रहें हैं,लूटे जा रहें हैं!!कोई सीधा बन्दूक के बल पर लूट लेता है,जिसे हम डकैती कहतें हैं,तो कोई  सरकारी नियमों में डकैती कर डकैतों से भी कई गुना की डकैती करते चले आ रहें हैं,मगर उनका कोई माई का लाल बाल भी बांका नहीं कर पाता क्योंकि उन्होंने बन्दूक नहीं उठायी हुई है और यह वीभत्स खेल दरअसल जनता के तमाम तरह के हितों की अनदेखी करके नहीं बल्कि उन्ही का हिस्सा हजम करके किया जा रहा है,और मजा यह कि किसी को राई-रत्ती भर भी शर्म नहीं आती !!
          और दरअसल यही वो जगह है जहां पर कि सवाल नहीं उठता,वो सवाल है शर्म का,जो दुर्भाग्य से हम सबने खो दी है,किसी ने ज्यादा तो किसी ने कम और जिसने जितनी ज्यादा शर्म खोयी है वो उतना ही ज्यादा वैभवशाली है और मजा यह भी है हमहीं लोगों ने उसे प्रतिष्ठा भी प्रदान भी की हुई है !! दोस्तों,आदमी अगर अपना कोई आचरण खो दे तो शायद उसे राह पर लाया भी जा सकता है मगर आदमी अगर अपनी शर्म ही खो दे तो वो एक पत्थर हो जाता है,जिस पर माथा पटकने से अपना माथा फूटने के सिवाय कुछ हासिल नहीं होता...!!और हम भारतीय अब वही पत्थर हैं जिस पर हमारा लोकतंत्र आज अपना सर पीट रहा है...माथा धुन रहा है,मगर मजाल है कि हमें कोई फर्क भी पड़े !!

अर्ज़ किया "जब एक ही उल्लू काफी था बर्बादे-गुलिस्ताँ करने को,हर शाख पे उल्लू बैठा है,अंजामे-गुलिस्ताँ क्या होगा...!!
--
http://baatpuraanihai.blogspot.com/




शनिवार, 26 नवंबर 2011

बस एक थप्पड़ !!??


मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!
बस एक थप्पड़ !!??
           आज के भारत का सबसे ताजा और मौजूं प्रश्न,आज के भारत के सबसे ज्यादा सुने और सराहे जाने वाले एक गैर-राजनैतिक व्यक्ति के मूंह से निकला हुआ और अब तक सर्वाधिक भर्त्सना का शिकार हुआ एक बयान,जिसे लोकतंत्र के खिलाफ और हिंसा के पक्ष में दिया गया एक गैर-जिम्मेदाराना बयान बताया जा रहा है,मगर सिर्फ राजनैतिक नेताओं और उनसे जुड़े लोगों द्वारा....आम लोगों में इस बयान के प्रति कोई भर्त्सना-भाव नहीं दिखाई पड़ता !! ऐसा लगता है कि आम लोगों का भी यही एक सवाल है.....बस एक थप्पड़ !!?? 
            आप ज़रा सोच कर देखिये कि एक अरब-पति ताकतवर नेता....पता नहीं कितनी संपत्ति का स्वामी....तरह-तरह के दबंग और ताकतवर लोगों का भी बाप....महाराष्ट्र का सबसे कद्दावर नेता...उसे थप्पड़ मारने के लिए कितना साहस चाहिए होगा...??क्या हममें से...आपमें से कोई ऐसा कर सकता है ??.....तो जिस भी किसी ने ऐसा किया है उसने अपनी मानसिकता के किन हालातों के मद्देनज़र ऐसा किया होगा...??और उसने ऐसा करने बाद क्या कहा है वो आपको पता है...??यही कि शरद पवार सबसे भ्रष्ट है और अरबों की संपत्ति का स्वामी है,जिसे हम पहले से ही जानते हैं और यह भी जानते हैं कि इस "मादरे-वतन"!! के 543 संसद-सदस्यों में से आधे से अधिक नेता अरबपति हैं,कुछ पहले से हैं,कुछ के कल-कारखाने भी हैं और कुछ पिछले वर्षों में बही बयार में अरबपति बन गएँ हैं !! सांसद-विधायक बनते ही बरस भर में कोई भी ऐरा-गैरा करोड़-पति बन जाता है और अगर मंत्री बन गया तो उसी अवधि में अरबपति !!??क्यों और कैसे ??!!  बिना किसी व्यापार आदि के बिना पढ़े-लिखे होने के भी....और यहाँ तक कि बिना किसी चरित्र-आचरण के बावजूद इस संसद-सदस्य/विधानसभा-सदस्य नामक जीव को ऐसे कौन से सुरखाब के पर मिल जाते हैं कि कोई नत्थू-खैरा भी हमारे-आपके ही संबंधों और वोटों से हम-आपके बीच से उठकर देखते-ना-देखते कहाँ का कहाँ पहुँच जाता है,उसकी बोली बदल जाती है,यहाँ तक कि वह अपने उस भूत के समाज तक को नहीं पहचानता,जहां से वो आया है !!और विस्मय से हमारी आँखें फटने-फटने को आ जाती हैं !!मगर नहीं फटती !!
           ये सब क्या है,ये सब क्यूँ है,ये सब कब तक चलता रहेगा ??और ऐसी राजनीति को कोई व्यक्ति थप्पड़ मार कर उसे उसकी सही औकात दिखा दे तो आप उसकी लानत-मलामत करने लगो ??अगर कोई कह दे कि बस एक थप्पड़ ,तो आप सारी संसद का अपमान मान लो ??अगर कोई ओम पूरी जैसा शख्स कुछ संसद सदस्यों को बे-पढ़ा-लिखा और असभ्य बता दे तो उसे नोटिस भेज उसे आखिरकार माफ़ी मानने को विवश कर दो....??अरे भाई आप लोग हो क्या....??जिन करोड़ों लोगों ने अपना विश्वास प्रदान कर आपको संसद में पहुंचाया है,उन्हें उसके बदले में तुमने क्या दिया है....अरे माननीय महान लोगों !!, पिछले साठ-बासठ-चौंसठ बरसों में आपने अपने घर को भरने के सिवाय और क्या किया है ?? आपको धंधा ही करना था तो आप नेता क्यों बने....दलाल बनते....ठेकेदार बनते....कुछ भी बनते ना...!!मगर नेता क्यूँ बने...??सिर्फ इसीलिए ना कि आपमें कुछ बन पाने की योग्यता नहीं थी.....!!??मोहल्ले-टोले-कस्बे-गाँव लोगों को उलटे-सीधे तरीके से भरमाते हुए आपने किसी के साथ अपनी गोटी फिट की और इस तरह पदार्पण हुआ आपका राजनीति में....!!अगर किसी रसूखदार परिवार से हुए तो सीधे-सीधे ही आका के पद पर जा बैठे !!मगर राजनीति का अर्थ क्या कभी आपने जाना भी....??क्या वतन की आबरू और राजनीति में कोई रिश्ता है,यह आपने समझा.....!!??क्या आज-तक आप यह समझ पाए हो कि भारतमाता को आपने अपनी रखैल बना कर रख दिया है....??क्या आप यह समझते हो कि इस भारतमाता के अंग-प्रत्यंग को आप चूसते जा रहे हो....??क्या आप जानते हो कि आपने अपने घर को भरने के लिए एक समूची पीढ़ी को  लालची-स्वार्थी-काहिल और बेईमान बना डाला है....??अरे ओ महान लोगों.....आपने इस देश का क्या कर डाला है.....क्या आपको पता भी है....??काहिल-भ्रष्ट-बेईमान-लम्पट-लालची और स्वार्थी  ठेकेदार....!!काहिल-भ्रष्ट-बेईमान-लालची-लम्पट और स्वार्थी  इंजीनियर काहिल-भ्रष्ट-बेईमान-लालची-लम्पट और स्वार्थी डॉक्टर...!!,काहिल-भ्रष्ट-बेईमान-लम्पट-लालची और स्वार्थी  शिक्षक...!!काहिल-भ्रष्ट-बेईमान-लम्पट-लालची और स्वार्थी स्टुडेंट.....!! काहिल-भ्रष्ट-बेईमान-लम्पट-लालची और स्वार्थी  अफसर...!!काहिल-भ्रष्ट-बेईमान-लम्पट-लालची और स्वार्थी एन.जी.ओ.....!!काहिल-भ्रष्ट-बेईमान-लम्पट-लालची और स्वार्थी  राजनीतिक कार्यकर्ता,जिनका अभीष्ट केवल और केवल आपकी सेवा-चाकरी और आपका गुणगान...!!और काहिल-भ्रष्ट-बेईमान-लम्पट-लालची और स्वार्थी वो तमाम तरह के लोग,जो आपके तमाम तरह के स्वार्थों को सिद्ध करने को ही अपना सबसे बड़ा कर्त्तव्य समझते रहे.....!!??
            अरे वाह रे ओ महान नेताओं....!!इस "मादरे-वतन"की सेवा हेतु यह कितनी सुन्दर फ़ौज आपने तैयार की है ना....आपने !!??लाखों-लाख की तादात में इन तमाम तरह के अकर्मण्य लोगों की इस फ़ौज को जन्म देकर क्या शान का काम किया है ना....!!??देश की इस मासूम जनता का अरबों रूपये का टैक्स आप इन अकर्मण्य लोगों में बाँट-बाँट कर वतन की जिस तरह की और जो सेवा करवा रहे हो ....सो यह जनता देखती आ रही है...!!??.....तो अब बताओ आप कि अब इस वतन का क्या करना है.....??जिन गरीब-गुर्गों के नाम पर अब तक योजनायें बना- बनाकर उनके हिस्से के अरबों-खरबों-महाशंखों रुपये अब तक जो आप सब मिलकर हजम कर चुके हो...और अब भी डकार नहीं लेते...!!...तो फिर ओ इस महान वतन के वतन के महान नेताओं अब यह तो बताओ कि इन कंगाल-भूखे-नंगे गरीब-गुर्गों को बंगाल की खाड़ी में फेंकना है या अरब सागर में....!!वैसे हिंद महासागर भी बहुत दूर तो नहीं ही है ना ....!!??
             मेरे/हमारे/हम सबके प्यारे-प्यारे महान अरबपति नेताओं जिस वतन की धरती की मिटटी का  आप सब खाते-पहनते आये हो...उस वतन की मिटटी का आपने जितना मान रखा है....उससे आपकी संसद कभी कलंकित नहीं हुई...??!!वतन का भाल पिछले हज़ार सालों से वैसे ही नीचा था....और पिछले चौंसठ बरसों में आपने उसे जितना नीचा और शर्मसार बनाया है उससे भी आपकी संसद कभी कलंकित नहीं होती...भारत माता के आँचल से और उसके गर्भ से अकूत धन-संपदा आप सब मिलकर आज तन बेहया होकर लूट-लूट कर खा रहे हो तब भी आपकी संसद कलंकित नहीं हो रही....मगर "सा..."कोई ओम पूरी कुछ बोल दे....कोई रामदेव कुछ कह दे...कोई अन्ना लोकपाल की मांग कर दे....या कोई हरविन्दर कोई एक अरबपति धंधेबाज नेता को थप्पड़ मार दे तो यही संसद...जो देश के बड़ी-से-बड़ी शर्मिन्दगी पर नहीं पसीजती ...??!! देश की आबरू लूट जाने पर भी नहीं कलंकित नहीं होती...!!??किसी पडोसी देश द्वारा इसकी भूमि हड़प लिए जाने पर भी द्रवित नहीं होती...!!??यहाँ तक कि संसद में बैठे अपराधियों और उनके द्वारा किये/करवाए जा रहे अपराधों पर भी कलंकित नहीं होती...!!??...एक क्षण-मात्र  में कलंकित हो जाती है कि संसद के तमाम माननीय सदस्यों का अपना महान और गर्व भरा चेहरा या मस्तक छिपाने को ठैया ही नहीं मिलता..!!??ऐसी महान संसद को शत-शत नमन है.....ऐसे महानतम संसद सदस्यों को हम-सब आम जनता का कोटि-कोटि प्रणाम !!??
             और अंत में....यही कि अन्ना-रामदेव याकि इस तरह के तमाम अ-सामाजिक लोग,जो खुद को देश का बड़ा पैरोकार समझते हैं...और ऐसा समझते हैं कि देश-हित में वही एक सही हैं...अपनी इस भ्रान्ति को यह आलेख देखते ही सुधार लें...क्योंकि जो भी लोग इस देश के काहिल-भ्रष्ट-बेईमान-लम्पट-लालची और स्वार्थी लोगों के खिलाफ आवाज़ उठाते हैं....दरअसल वो लोग खुद ही देश द्रोही हैं....और इसके मद्देनज़र या तो वे खुद ही यह देश छोड़कर चलें जाएँ या फिर जल्द ही किसी अदालत द्वारा फैसला सुनाकर ऐसा ही कुछ किया जाने वाला है...!!और यह भी कि कांग्रेस ही इस वतन की सच्ची रखवाली है...आज़ादी के पूर्व से ही वो इस वतन की सेवा अपने पूरे "तन-मन-धन"से करती आई है....सो अपने पूर्वजों के पुण्य का फल भी तो उसी के वंशजों को मिलना चाहिए ना....!!तो इस महान वतन के ओ तमाम भीखमंगे लोगों आपसे इस नाचीज़ की मार्मिक अपील है कि आप  इस कांग्रेस के वर्तमान तारणहार वंशज इटली-पुत्री के महान सुपुत्र संत-शिरोमणि "श्री-श्री-श्री राहूल गांधी जी महाराज" को ही अपना अगला प्रधान-मंत्री बनाना !!और कभी किसी ऐसे व्यक्ति को दंड देने के बारे में सोचना भी मत जिन्होंने तुम्हें इस भीखमंगाई के हालात में पहुंचाया है जय-हिंद....!!

शनिवार, 19 नवंबर 2011

इस वतन का भला सोचनेवाले ही असल में देश-द्रोही हैं !!

मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!
            रोज की तरह रोज अखबार पढता हूँ....और इनके माध्यम से अपने आस-पास की अच्छाईयों और बुराईयों से अवगत होता हूँ...कहना ना होगा कि अच्छाईयों से ज्यादा बुराईयों के समाचार ही छाए हुए होते हैं तमाम तरह की ख़बरों में.....ऐसा लगता है कि आदमी ने अपने खुश रहने का माध्यम ही हर तरह की बुराई को बना रखा है...और मज़ा यह कि इसी समाज से इन्हीं बुराईयों के खिलाफ प्रलाप का सूर भी उसी समय बिखरता होता है....पता नहीं क्यूँ हर एक आदमी को अपना किया हुआ सब कुछ सही और किसी दुसरे का किया हुआ वही सब कुछ ना सिर्फ गलत,अपितु नाजायज तक लगता है...ऐसे में इस समाज की सोच की बुनियाद में कोई तुक ही नज़र नहीं आती !!
              अपने इस भारत नाम के देश में जिसे जो समझ में आता है,करता है,जो जहां बैठा है वहीं से भारत का खून चूसता रहता है....इसकी मांस-मज्जा को बड़े चाव से किसी मीट-मुर्गे या बकरी के गोश्त की तरह अपनी जीभ के लार के साथ अपने पेट के भीतर हज़म करता जाता है....जो जहां है,वहीं से व्यवस्था के पावों को काटता जाता है और अव्यवस्था को फैलाने में ना सिर्फ अपना योगदान देता है बल्कि उसे स-उत्साह नयी उमंगें-नयी ऊंचाईयां भी प्रदान करता है !!
            मानव-धन और युवा-बल-धन से परिपूर्ण यह देश अपने ही रहनुमाओं के चुंगल में कसमसाता-छटपटाता रहता है....यह वो देश है जिसके कसीदे पता नहीं कब से गाये जाते रहे हैं....और इस युग में भी नए तरह के गान से इसकी तरक्की का स्वागत होता दीख पड़ता है...मगर समझ ही नहीं आता कि यह देश आखिर है तो है क्या !! कुछ दस-हज़ार या कुछेक लाख अमीर लोगों का एक गाँव....या कि करोड़ों अभीशप्त-बेबस लोगों का एक संजाल मात्र.....!!
            चाँद और मंगल की ओर यात्रा करते हुए इस देश का भविष्य आखिर क्या है ??भूखे-नंगे लोगों से भरे हुए इस देश की भीतरी औकात आखिर है क्या ??काहिलों,कामचोरों और नकारा लोगों से भरे हुए लोग कैसे इसे इसके असली और वांछित मुकाम पर पहुंचाएंगे....??और तो और एक-दम से भ्रष्ट और बे-ईमान इसके रहनुमा इसे आखिर कहाँ लेकर जाना चाहते हैं....??
            बेशक हर जगह की तरह यहाँ भी अच्छाई है....मगर वो इतनी कमतर और क्षीण है कि कोई अच्छी-सी आशा करना भी अब मज़ाक लगता है.....अब सोचने लगा हूँ कि इस वतन का सचमुच भला सोचने वाले और करने वाले ही असल में देश-द्रोही हैं....आमीन....!!
बुधवार, 26 अक्तूबर 2011

अन्धेरा हमारे आस-पास घिरता जा रहा है....!!

मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!
             आज,जैसा कि सब जानते हैं,दीवाली का पर्व है,और भारत देश में चारों और हैप्पी-दीवाली,हैप्पी-दीवाली के स्वर बोले जा रहें हैं...और इस पर्व को मनाने की तैयारियां भी चारों तरफ की जा रहीं हैं !सभी तरफ बाज़ारों में बेशुमार भीड़ है गोया कि हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी....और इस भीड़ के कारण हर तरफ जाम-ही-जाम भी है ! लोग खरीदारी-पर-खरीदारी किये जा रहें हैं !अभी दो दिन पूर्व ही धनतेरस का पर्व भी आकर गया है,जिसमें लोगों ने हज़ारों करोड़ की खरीदारी की है पूरे देश में,अब दो ही दिन बाद भी इससे कोई कम खरीदारी नहीं की जाने वाली है....लोगों का पेट भरता ही नहीं,परम्परा जो ठहरी !!


             खरीदारी के इस वातावरण को देखते हुए ऐसा कभी महसूस भी नहीं हो सकता कि गरीबी नामक किसी चिड़िया का बसेरा भी इस देश में है....और यही वो देश भी है,जहां आज भी लाखों-लाख लोग भूखे ही सो जाने वाले हैं !!"उत्सव" के माहौल में किसी का रोना-पीटना लाजिमी नहीं लगता ना दोस्तों...?मगर पता नहीं क्यों हमारे जैसे कुछ लोगों को सुखी लोगों की खुशियाँ देखे ही नहीं भाती....तभी तो इन खुशनुमा पलों में भी मातम ही मनाने को होता है और इस तरह रंग में भंग हो जाता है मगर क्या करूँ अपनी भी आदत ही ऐसी है !

              दोस्तों,पता नहीं क्यूँ मुझे हमेशा इस इस चकाचौंध के पार अन्धेरा ही दिखाई देता है....आत्मरति में लीन हम सब खुशियों भरे लोग गोया खुशिया नहीं मना रहे होते,अपितु करोड़ों-करोड़ लोगों के मुख पर तमाचा-सा मार रहे होते हैं....!!जब लाखों हज़ारों रुपये खर्च करके हम जैसे लाखों लोग खुशियाँ मनाते हैं,तब करोड़ों लोग हमें टुकुर-टुकुर ताकते रहते हैं मुहं बाएं हुए....हमको पता भी नहीं होता कि हमारे आस-पास ही रहने वाला एक बहुत बड़ा वर्ग रोजमर्रा की जिन्दगीं में हमसे जुदा हुआ होकर भी हमारी इन बेपनाह खुशियों में शरीक नहीं रहता....और मजा यह कि हम पढ़े-लिखे सभ्य लोगों को इसका पता भी नहीं होता...!!
            
  इसीलिए दोस्तों...हरेक बार जब दीवाली आती है,मेरा मन उदास हो जाया करता है...बल्कि मनहूस-सा हो जाया करता है....इस दिन मैं जिन्दगी में सबसे ज्यादा बोर....सबसे ज्यादा उदास हो जाता हूँ...क्यूंकि मैं देखता हूँ कि इस दीवाली को अन्धेरा और भी घना हो गया है....इस तरह दोस्तों हरेक दीवाली में बढती हुई कारपोरेट चकाचौंध-धमक और जगमग के बावजूद और भी ज्यादा अन्धेरा हमारे आस-पास घिरता जा रहा है....!!और एक बात बताऊँ दोस्तों...??जल्दी ही यह अन्धेरा इतना घना हो जाने वाला है...कि हमें ही डंस लेने वाला है....क्यूँ कि हमें यह पता भी नहीं कि इस अँधेरे के एक जिम्मेवार कहीं-ना-कहीं हम खुद भी हैं...!! 

मंगलवार, 4 अक्तूबर 2011

रूहें खानाबदोश क्यूँ हुआ करती हैं.....??



मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!

            पता नहीं क्यूँ रूहें खानाबदोश क्यूँ हुआ करती हैं.....और ख्वाब क्यूँ आवारा....!!क्या हमारे भीतर किसी रूह का होना कहीं कोई ख्वाब ही तो नहीं....या कि हम कहीं ख़्वाबों को ही तो रूह नहीं समझ बैठे हैं....क्यूंकि सच में अगर रूह हुआ करती तो आदमी भला बेईमान भला क्यूँकर हुआ करता...!!अगर सच में आदमी के भीतर रूह हुई होती तो उसका अक्श भी तो उसके भीतर दिखाई दिया होता....हज़ारों हज़ार बरसों में कुछ सैंकड़े आदमों में ही इसकी खुशबू तो नहीं पायी जाती ना....अब जैसे फूल के भीतर अगर खुशबू है...तो वह भले ही दिखाई नहीं देती....मगर उसकी गंध तो साफ़-साफ़ हम ले पाते हैं ना अपने भीतर...!!अब जैसे किसी भी वस्तु का जो भी स्वभाव है...उसे हम प्रकटतः देख-सुन-महसूस तो कर पातें हैं ना...यह बात ब्रहमांड के भीतर व्याप्त हरेक पिंड-अपिंड में लागू होती है....उसी तरह आदमी के भीतर अगर रूह का होना सचमुच सच है....तो कहाँ है भला उसकी खुशबू....कहाँ है उसका कोई स्वभाव....जो उसे सचमुच रूह-युक्त करार देवे....??
              बेशक ख्वाब तो आवारा ही हुआ करते हैं....और उनका आवारा होना ही बार-बार हमें किसी ना किसी तरह से जन्माता है....मारता है....हमें जीवन्तता प्रदान करता है....रूह और ख्वाब का सम्बन्ध सचमुच किसी ना अर्थ में सही है.....आदमी जो ख्वाब देखता है....दरअसल उनका कोई अस्तित्व ही नहीं हुआ करता....आदमी ख्वाब में अपनी जो दुनिया निर्मित करता है....वह दरअसल कभी बन ही नहीं पाती....आदमी ख्वाब देखता चला जाता है....और सोचता चला जाता है कि वह कल ऐसा कर लेगा....वह कल ऐसा कर लेगा...हर कल आज होकर फिर से गुजरे हुए कल में बदल जाता है....ख्वाब,ख्वाब ही रहता है....हकीकत नहीं बन पाता....मगर आदमी की आशा एकमात्र ऐसी चीज़ है....जो कि आदमी का भरोसा उसके ख्वाब से बिलकुल नहीं छूटने देती....आदमी रोज उन्हीं ख़्वाबों में जिए चला जाता है...जो प्रतिदिन टूटा करते हैं....और जिन्दगी में ना जाने कितनी बार टूटते ही चले जाते हैं....और आदमी भरोसा किये चला जाता है.....आदमी आशा किये चला जाता है....जिन्दगी एक आस है....सपनों के पूरा होने का.....और जिन्दगी एक प्यास है....जिन्दगी को जिन्दगी की तरह पी जाने का....किसी की प्यास कम बुझ पाती है...किसी की ज्यादा....और किसी को तो पानी ही नहीं मिलता....जीने के लिए....मगर वो भी जीता है....जिन्दगी ख्वाब है एक भूखे की रोटी का....!!
                    हाँ ख्वाब और रूह का  सम्बन्ध तो है ही....ख्वाब उन्हीं चीज़ों के देखे जाते हैं अक्सर....जो है ही नहीं....और आदमी में रूह का होना भी एक ख्वाब ही है....क्यूंकि वो तो आदमी में है ही नहीं.....!!
शनिवार, 1 अक्तूबर 2011

क्या हम सेक्स जनित विसंगतियों पर काबू पा सकते हैं? http://www.amankapaigham.com/2011/07/blog-post_28.html

मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!

क्या हम सेक्स जनित विसंगतियों पर काबू पा सकते हैं?

          

इस पोस्ट को पढने से ज्यादा वक्त इस पर आये वक्तव्यों को पढने में लगा,और जहां जिसके साथ जिन कारणों से विवाद हुआ लगा,वहां और तल्लीनता के साथ पढ़ा...और मुझे ऐसा भी लगा की रचना जी के वक्तव्यों का अर्थ स्थूल रूप में,या कहूँ कि गलत सन्दर्भों से जोड़कर गलत तरीके से गलत ही लिया जा रहा है,जबकि यहाँ वस्तुतः कोई है ही नहीं,बस ज़रा सोच के तरीके का फर्क है,एक जाना टांग पकड़ रहा है,तो दूसरा सर...जबकि सच तो यह है कि दोनों हिस्से दरअसल एक ही धड में है,भाई लोगों एक बात मैं आपसे आज्ञा लेकर कहना चाहता हूँ,कि स्त्री जाति के कपड़ों के छोटे होने के कारण भी बलात्कार होते हैं,इस बात से मैं भी पूर्णतया सहमत हूँ,रचना जी आप भी इसे ठीक तरह से समझ लें,क्यूंकि दो-तीन-चार साल की बच्चियों के साथ भी तो शायद इसीलिए बलात्कार किये जाते हैं,क्यूंकि वो नंगी होती हैं...!!है ना भाईयों...??क्या ख्याल है आप सबों का ??अधेड़ औरतों के संग भी बलात्कार होता है,शायद वे भी समाज में नंगी ही घूमा करती हैं....है ना दोस्तों....??क्यूँ अपनी कमियों को छुपाता है यह पुरुष नाम का जीव....जो औरत को कपड़ों के भीतर भी नंगा देख लेता है,आप सुन्दर स्त्रियों से जाकर पूछिए कि उन्हें आपादमस्तक कपड़ों से परिपूर्ण होने के बावजूद अक्सर बहुत सारे पुरुषों की किस प्रकार की प्रशंसनीय नज़रों का शिकार होना पड़ता है स्कूल जाती हुई छोटी-छोटी छात्राओं से जाकर पूछिए कि प्रत्येक-चौक चौराहों पर हर उम्र के पुरुष की उन पर किस प्रकार की सुन्दर दृष्टि हुआ करती है...!!औरत पुरुष की दृष्टि-मात्र के आगे पानी-पानी हो जाया करती है,ऐसी है पुरुष नाम के इस जीव की दृष्टि,जिससे बचने के लिए औरत नाम की जीव सदा नज़रें झुका कर चलती है !!
                   दोस्तों अपनी जाति के दोषों को छिपाने से अपना कुछ भला होने को नहीं है,जो सच है,उसे स्वीकार कीजिये ना....आप भी अपने भीतर झांकिए ना कि तरह-तरह की औरतों के अपने सामने से जाते हुए देखने पर आपके भीतर उसके प्रति किस प्रकार के सम्मान की भावना हिलोर मारती है!!मेरा ख्याल है उस जाति हुई औरत से ही पूछ लीजिये ना,जिसे जाता हुआ देखते उसके आपके बगल से पार हो जाने के बाद आपकी आँखों से ओझल हो जाने तक भी आपकी दृष्टि उसके शरीर पर टिकी हुई हो सकती है,मैं बताऊँ कहाँ पर...??"उसके भारी नितम्बों पर !!"
                  दोस्तों,समस्या तो वह ठीक की जा सकती है ना,जिसे सबसे पहले उसकी बुनियाद से ही समझ लिया जाए....मान लो कि कोई स्त्री आपके सामने से कम कपड़ों में गुजर ही जाए...तो इससे आपके शरीर के अंग भला क्योंकर हिलोर मारने लगेंगे....??सच कह दो ना यार...कि तुम्हारा चरित्र अभी कच्चा है !!किसी रचना या किसी और नाम की औरत पर कीचड फेंकने से भला क्या प्राप्त होगा....उनकी तरफ से भी वही...यही ना...??कपड़ों और अदाओं में बलात्कार की वजह खोजने वालों तुम सब भला क्यूँ यह स्वीकारो कि पुरुष के चरित्र में ही कहीं कोई गड़बड़ है,कि वह स्त्री को सम्मुख पाकर सिर्फ उसे दैहिक रूप में ही देख पाता है,बहुत से लोग तो मन-ही-मन उसे भोग भी लेते ही हैं !!
                 तो मेरे प्यारे-प्यारे-प्यारे दोस्तों स्त्री के कपड़ों में कोई गड़बड़ हो ना हो...हमारे चरित्र में तो अवश्यमेव ही है जो कि स्त्री के सन्दर्भ में ज़रा कमजोर पड़ जाता है,स्त्री से मिलते ही अपनी आवाज़ में आयी हुई तब्दीली को महसूसा है कभी आपने में से किसी ने....??यदि नहीं तो अगली बार किसी स्त्री से मिलते हुए इसे समझने की चेष्टा अवश्य करना आप सब...!!यार मान क्यूँ नहीं लेता यह मर्द कि स्त्री उसकी कमजोरी है और उसे अपनी वस्तु समझना उसकी सीनाजोरी !!अब कमजोरी वाली बात तक तो ठीक है,मगर सीनाजोरी वाली बात गलत हो जाती है....जन्मों से पुरुष के हर कार्य में अपनी पूरी आत्मा से हाथ बंटाती यह औरत पुरुष की हर तरह की जायज-नाजायज हिंसा की शिकार बनती है,क्या यह जायज है....??छोटी-बच्चियां तक पुरुष की कामुक नज़रों का शिकार बनाने से बच नहीं पाती...क्या यह जायज है... ??ज्यादातर वह पुरुष से हेय समझी जाती है....और उसी तरह दोभात होती हुई पाली जाती है....क्या यह जायज है....??समूची धरती पर जहां भी वह पेशेवर है...पुरुष के बराबर काम करने पर उसका मेहताना पुरुष से कम है....क्या यह जायज है...??समूची धरती पर वह अपने दारुबाज रिश्तेदारों द्वारा प्रताड़ित और शोषित की जाती है...अपने ही लोगों द्वारा बेचीं तक जाती है...क्या यह जायज है.....दोस्तों मामला सिर्फ बलात्कार का नहीं है....यह मामला स्त्री को अपनी जबरिया बनाने का है....बलात्कार तो उसका एक हथियार भर है...आप अपने गुलाम के संग कुछ भी कर सकते हैं...पुरुष की स्त्री के साथ इसी तरह की यह घोषणा भर है...कि वह सिर्फ पुरुष की बपौती है,इसके अलावा उसका कोई औचित्य नहीं है...यह पुरुषना थेथरई भर है....और जब तक पुरुष अपनी यह थेथरई मार कर दूर नहीं भगा देता...तब तक औरत के साथ हो रहे किसी जुल्म का खात्मा तो दूर की कौड़ी....वह इसकी बाबत सोच पाने में भी असमर्थ है,बेशक वह दावे वह बड़े-बड़े करे....यह तो वह बाबा आदम जमाने से करता आ रहा है....उसने अपने कितने दावे पूरे किये हैं,यह हम और आप सब जानते हैं....!!    

--
http://baatpuraanihai.blogspot.com/
शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

प्रबंधन के कुछ गैर-पारिभाषिक एवं गैर प्रचलित सूत्र !!

मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!

प्रबंधन के कुछ गैर-पारिभाषिक एवं गैर प्रचलित सूत्र !!

प्रिय भाई ,
              तुम्हें मेरा अत्यधिक प्रेम, 
               आज तुमसे कुछ बातें शेयर करने को दिल चाह रहा है,किन्तु आमने-सामने देर तक कुछ कहा जाना और सामने वाले का उसका सूना जाना अब बड़ा दुरूह हो चुका है,इसलिए यह पत्र तुम्हें लिख रहा हूँ कि तुम बड़े इत्मीनान से समय लेकर पढ़ सको,और जब अवसर मिले इसे पढ़कर प्रबंधन के कुछ गुर सीखो और मज़ा यह है कि प्रबंधन के विषय में इस तरह की बातें प्रबंधन की किसी पुस्तक में नहीं बतायी जाती ,मगर मुझे आशा है कि आने वाले दिनों में मेरे इस पत्र को प्रबंधन की पुस्तकों में एक पाठ की तरह शामिल कर लिया जाएगा .
                भाई मेरे,(1) हम जैसे व्यापारी लोग अपने व्यापार के लिए जिस तरह के लोगों से काम लेते हैं,वो ज्यादातर बेहद अकुशल,अशिक्षित और बेहद गंदगी वाले माहौल से आने वाले विवश और गरीब लोग होते हैं,जिन्हें यह पता नहीं होता कि कर्मठता किस चिड़िया का नाम है और किस तरह का आचरण करके आप मालिक की नज़र में एक "अच्छे मजदूर"बन सकते हो,हाँ यह जरूर है कि अक्सर वे ईमानदार अवश्य होते हैं,जिसके कारण वे अपने मालिक के विश्वासपात्र बन जाते हैं (बेशक यह विश्वास कभी भी इस स्तर पर नहीं पहुँच पाता कि मालिक अपना गल्ला उनके हवाले करके पेशाब करने भी जाए,और मैं इसका अपवादस्वरूप हूँ.
                इसलिए भाई मेरे इन्हें काम सिखाना और इनसे  काम लेना कुछ समय तक बहुत कठिन होता है.इनमें कुछ लोग बेहद समझदार भी होते हैं बाकी ज्यादातर तो गैर-समझदार ही,मगर इसका मतलब यह नहीं कि वो मूर्ख ही हों,जैसा कि मालिक लोग समझते हैं ! किन्तु धरती का ऐसा कोई हिस्सा नहीं जहां कि गालियों,लताड़ों,दुत्कारों द्वारा किसी को कोई काम समझाया या सिखाया जा सकता होओ,जहां भी ऐसा होता है,वे मानवीयता की दृष्टि से बेहद शर्मनाक जगहें होती हैं,जिनका मैं कतई कायल नहीं.आपके पास किसी भी गैर-कुशल मजदूर-स्टाफ का रहना आपके एक टीचर होने की डिमांड करता है,ये आप ही हैं,जिसने एक गैर कुशल स्टाफ या मजदूर को दो वजहों से चुना है,
                  एक,या तो आप अपने काम के एवज में उसे यथोचित- उचित या कहूँ कि ज्यादा मेहनताना दे पाने में सक्षम नहीं है,या फिर अपनी कमाई के लालच में उसका शोषण करना चाहते हैं,मगर दोनों ही हालातों में उस मजदूर का चुनाव सिर्फ-व्-सिर्फ आपका और आपका है और इसके लिए आप उस गैर-कुशल अकुशल,अशिक्षित व्यक्ति को ज़रा-सा भी दोष नहीं दे सकते,जिसे आपने अपनी मर्जी,विवशता या लालच के कारण चुना है,इसलिए यह आपका प्रथम एवं अनिवार्य कर्तव्य है कि अब आप उसकी समुचित टीचिंग करें,ना कि रैंगिंग .
                दूसरा,समूची धरती पर मजदूरों या स्टाफों के रूप में छोटे-छोटे बच्चों का उपयोग होता है,जो मेहनत की दृष्टि से उचित,बल्कि अत्यधिक(उनकी क्षमता से काफी अधिक) और मेहनताने की दृष्टि से कमतर तथा प्रताड़ना की दृष्टि से लाज़वाब जान पड़ते हैं,जिन्हें पशुओं से भी बदतर खटाकर बात या लात से प्रताड़ित किया जाता है!अब आप ज़रा यह सोच कर तो देखो कि जिस तरह आप उस बच्चे,जो मजबूरी के मारे अपना घर छोड़कर खेलने-खाने की उम्र में आपके पास काम करने आता है तो उसकी आपसे यह अपेक्षा तो कतई नहीं रहती होगी कि आप उससे पशुओं जैसा व्यवहार करोगे,बल्कि वह जो बच्चा जो किन्हीं भी कारणों से आपके पास है,उसकी अपेक्षा और ईच्छा आपसे अपनी मेहनत के बदले प्यार और सम्मान पाने की होती होगी,जैसा कि आप खुद अपने लिए चाहते हो अपने खुद के काम के एवज में !तो आप यह तो सोचो कि जो आप अपने लिए चाहते हो उससे किसी दूसरे को क्यों वंचित करना चाहते हो,या कर ही डालते हो,महज इसलिए कि आप शिक्षित हो हुनरमंद हो ??तो आप अपना हुनर उसे सिखाओ ना,अपने हुनर या ज्ञान को खुद तक सिमित रखना दुनिया का सबसे बड़ा अहंकार और स्वार्थ है !(इस नाते मैं ये भी मानता हूँ कि व्यापार में जिसे मोनोपोली कहते हैं,वह भी इसी श्रेणी का अहंकार,स्वार्थ और मानवता को शर्मसार करने वाला है,जिसे यह "सभ्य" मनुष्य अपने साथ पता नहीं कैसे चिपटाए हुए है और करते हुए भी वह खुद को सभ्य कहता है !
                बगैर उचित टीचिंग के दुनिया अच्छी नहीं बनायी जा सकती और इसके लिए यह आवश्यक है कि आप किसी भी किस्म के दुराग्रह और कुसंस्कार से दूर हों !अगर आप किसी भी तरह से अपने लिए एक अच्छा समाज चाहते हैं तो आपको हर हालत में खुद को बेहतर,और बेहतर,और बेहतर बनाना ही होगा !आप खुद विगलित रहते हुए कुछ भी अच्छा चाहने का हक़ तक नहीं रखते !
               तीसरा,धरती पर मालिक की जात एकमात्र ऐसी जात है,जो खुद को सदैव बिलकुल सही समझती है,अपने ज्ञान को सही समझती है,मगर अपने ज्ञान को आप सही समझो,यहाँ तक तो ठीक है,मगर दूसरे के ज्ञान को कमतर या तुच्छ समझना यह कहाँ की शरीफी है ?और इसी कारण मैंने देखा है कि कई बार स्टाफ के उचित परामर्श को मालिक महज इसीलिए नहीं मानता कि वह परामर्श एक स्टाफ का है !कई बार स्टाफ का प्रैक्टिकल अप्रोच मालिक की अपेक्षा ज्यादा समीचीन होता है,मगर मालिक उसकी बात ठीक से सुनता तक नहीं अपने मालिक होने के अहंकार या ठसके के कारण....मगर बात यहीं तक जा रूकती तब भी गनीमत थी,मगर होता तो यहाँ तक है कि अपनी उस थेथरई के कारण पनपी समस्याओं को भी नहीं समझते,या समझने का प्रयास तक नहीं करते,दूसरे शब्दों में अपनी गलतियों को ना मानकर भविष्य की बेहतरी के लिए कोई सबक नहीं सीखते !और इस तरह मालिक और-नौकर का रिश्ता बेहद कटुतम होता चला जाता है और मैं चाहता हूँ मेरे भाई,तुम ऐसे कतई ना बनो !!
                 अपने द्वारा किया गया बेहतर से बेहतर काम भी अपने द्वारा की गयी स्वभाववश या अनजानेवश गलतियों के कारण नकारा हो जाता है !मालिक कम-से-कम यह तो सोचे कि हो सकता है कि बेशक खुद वही सही हो,मगर अपने सही होने के कारण उसे किसी को प्रताड़ित करने का हक़ तो नहीं मिल जाता ना !उसे अपने सही होने के तर्क को अपने स्टाफ की भाषा में ही अपने स्टाफ को समझाना होगा,ना फटकारपूर्ण शब्दों में और गलत लहजे का इस्तेमाल करते हुए वह स्टाफ को कुछ कहे !मगर जहां मालिक ही गलत हो वहां स्टाफ क्या करे,किन शब्दों में मालिक को समझाए !!उसके पास तो मालिक वाली भाषा या मालिक वाला संस्कार तो नहीं ना..!!(यहाँ यह जोड़ देना मैं उचित समझता हूँ कि तमाम संस्कार और शिक्षितता के बावजूद मालिक व्यवहार कु-संस्कार वाला करे तो उसे कौन सी कैटेगरी में रखा जाए ??) 
                 इसलिए मेरे भाई जिसे तुम स्टाफ को सर चढ़ाना समझते हो वो मेरे लिए मेरी मानवता है,मेरा संस्कार है ,मेरा चरित्र है और वही सही भी है,ऐसा मेरा मानना है,चाहे इसे कोई माने या ना माने !इस पत्र को पढ़कर मैं आशा करता हूँ कि शायद तुम गैर-कुशल,अशिक्षित श्रमिकों से उचित व्यवहार करना सीखो !इसके लिए सदैव यह ध्यान रखना होगा कि वह तो जो है,सो है,मगर आप तो कुशल हो ना,आप तो शिक्षित हो ना,आप तो संस्कारवान हो ना,आप तो कुशल हो ना !!तब आप अपनी गैर-समझदारी क्यों प्रदर्शित करते रहते हो,आप मालिक हो ना,तो आप मालिक ही रहो ना व्यवहार के निचले तल तक जाकर अपनी तौहीन क्यूँ करवाते हो ?स्टाफ के साथ बगैर उसकी गलतियों के भी उसके साथ गलत व्यवहार करना,स्टाफ को किसी भी बात को भर्त्सनापूर्ण शब्दों में समझाना,यह मालिकियत नहीं नहीं मालिकियत का कुसंस्कार है,जिसे अगर मगर त्याग दे दुनिया के सभी मजदूरों का अपने मालिकों के साथ सुन्दरतम रिश्ता कायम हो सकता है,बाकी ऊपर वाला तो सबका मालिक है ही.....है ना भाई !!
                  पुनश्चः,ये बातें मैं तुम्हें इसलिए लिख सका क्यूंकि मैं समझता हूँ कि तुममे पर्याप्त समझदारी है इन बातों को समझते हुए खुद को तदनुरूप ढाल लेने की,क्योंकि अपने काम में पारंगत होते हुए भी दुनियादारी में गैरव्यवहार-कुशलता बहुत बार आपको नीचा दिखाती हैं,और आप बेहतर होते हुए भी उंचाईयों को नहीं छू पाते ,क्योंकि काम में पारंगतता एक अलग बात है,और अपना आचरण एक दूसरी बात !!आप काम में पारंगत होते हुए भी आचरण में पर्याप्त मधुरता ना होने के कारण उचित मुकाम हासिल करने में अक्षम हो सकते होओ मगर काम में अपारंगत होते हुए भी सुमधुर आचरण से उन्हीं उंचाईयों को प्राप्त कर सकते हो !
                 दुनिया का सबसे बड़ा अस्त्र है मीठी बोली या मधुर आचरण !! 

धरती पर बढ़ेंगे अभी और बलात्कार !!

मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!

धरती पर बढ़ेंगे अभी और बलात्कार !!

               शीर्षक पढ़कर चौंकिए नहीं क्योंकि तरह-तरह के अध्ययनों के अनुसार जो तथ्य सामने आ रहे हैं उनसे दो बातें स्पष्टया साबित होती हैं,एक,धरती पर पुरुष-स्त्री का लिंगानुपात असामान्य रूप से असंतुलित होता जा रहा है,दूसरा,संचार के तमाम द्रुतगामी साधनों की बेतरह उपलब्धता के कारण आदमी जल्द ही व्यस्क होता जा रहा है,आदमी जहां पूर्व में इक्कीस-बाईस में,फिर सत्रह-अट्ठारह में,फिर पंद्रह-सोलह में और अब तेरह-चौदह वर्ष की उम्र में ही व्यस्क हो रहा है,जबकि लड़कियों में यह उम्र बारह-तेरह की निम्नतम स्तर को छु गयी है !!
                इसका एक मात्र कारण आधुनिक युग के संचार के साधन हैं,जहां अब कुछ भी गोपन नहीं है,पहले जहां किसी प्रकार की कामुक सामग्री बहुत कठिनता से प्राप्त हुआ करती थी,वो भी छपी हुए रूप में,जिसे छिपाना अत्यंत असाध्य हुआ करता था,जिससे ऐसी सामग्री को घर में लाने से कोई किशोर डरा करता था,मगर अब किशोरों की तो क्या कहिये,बच्चे-बच्चे के हाथ में मोबाईल के रूप में चौबीसों घंटे उपलब्ध रहने वाला ऐसा साधन उपलब्ध है,जिसके साथ कोई भी किस चीज़ का आदान-प्रदान कर रहा है,कोई नहीं जान सकता,क्योंकि देख-पढ़ लेने के बाद डीलीट करने के ऑप्शन के कारण आप कुछ भी चिन्हित नहीं कर सकते हो,दूसरी और किशोरों के हाथ में इंटरनेट नामक एक ऐसा हथियार आ चुका है,जिसे वो अपनी क्लास छोड़-छोड़ कर चाहे कितनी ही बार इस्तेमाल करने जा सकते हैं,जाते हैं.मगर अब तो यह मोबाईल में भी चौबीस घंटे उपलब्ध है!!आपने अपने बच्चों के हाथों में ऐसी चीज़ें उपलब्ध करवा दी हैं,जिसका उपयोग अब वो अस्सी से नब्बे प्रतिशत तक अपना यौवन बढाने के लिए ही करते हैं,आप भी अब खुश हो जाईये कि अब आप अपने ही बच्चों का कुछ भी नहीं "उखाड़"सकते!!ऐसे शब्दों का उपयोग मैं इसी कारण कर रहा हूँ,क्यूंकि मैं देख पा रहा हूँ,कि आगे क्या तस्वीर उभर रही है,जिसे बदल पाना हमारे बस के बाहर है दोस्तों !!
                धरती पर पुरुष-स्त्री के असंतुलित होते जाने के बरअक्श आप इस तस्वीर को सामने रखिये तो आपको इसकी भयावहता का अंदाजा लगेगा.एक तरफ कामुक होते किशोर तो दूसरी तरफ घटती स्त्री की आबादी,इन दोनों को एक साथ रखकर देखिये तो बात साफ़ हो जाती है.धरती पर पहले ही पुरुष द्वारा स्त्री पर जबरन किये जाने बलात्कारों की सीमा भयावहतम सीमा को पार कर चुकी है,जो अब रोजाना लाखों की संख्या में है,ऐसे में धरती पर आने वाले दिनों में स्त्री की अनुपलब्धता किस स्थिति को जन्म देने वाली है,इसकी कल्पना भी नहीं जा सकती !!बच्चे जब जल्द युवा होंगे तो उन्हें जल्द ही स्त्री भी चाहिए होगी,और क़ानून या समाज की उम्र की बंदिशें उन्हें यह करने से रोकेंगी,तब ऐसे में क्या होगा??
                  दोस्तों प्रकृति में जो भी कुछ है,वो एक-दुसरे के जीवन-यापन की ही एक भरपूर श्रृंखला है.इस श्रृंखला की अनेकानेक इकाईयों को आदमी अपनी कारस्तानियों के कारण मेट चुका है,मगर अब अपनी ही जाति की व्याप्त बुराईयों की वजह से स्त्री को माँ के पेट में ही नष्ट कर देता है,यह उसकी इस "थेथरई"का ही परिचायक है,कि हम अपने भीतर की बुराईयों को नहीं मिटाएंगे,जिसके कारण हम स्त्री को अजन्मा ही मार डालते हैं,बल्कि स्त्री को ही मार डालेंगे!!सच भी है,ना रहेगा बांस,ना बजेगी बांसूरी...!!
         मगर ओ पागल धरतीवासियों मगर इसी बांसूरी को बजाने के कारण ही तुम्हें सुख भी मिल रहा है,साथ ही धरती भी चल रही है,और तुर्रा यह कि यह सुख तुम्हें शायद चौबीसों घंटे भी मिले तो तुम अघा ना पाओ,तब तो ओ पागल लोगों इस बात को तुम समझो कि इस सुख को पाने के लिए,जिसके लिए ना जाने तुम कितने ही तरह के धत्त्करम करते चलते हो,ना जाने कितने झूठ बोलते हो,धूर्ततायें करते हो,जिस सुख की खातिर तुम्हारे मनीषी,साधू-पादरी और ना जाने कौन-कौन से महापुरुष अपना सम्मान विगलित कर गए!!उसके अनिवार्य माध्यम को मिटा देना तुम्हारी कौन सी समझदारी है,यह तो बताओ !!??
                 प्रकृति में हर-एक चीज़ के होने का कोई-ना-कोई कारण है,उसकी उपादेयता है तथा उसके ना होने से व्यापक हानि भी है,स्त्री के सम्मान-वम्माम को तो मारो गोली,वह तो पता नहीं आदमी कब सीख पायेगा,किन्तु एक जैविक तत्व होने के नाते भर से भी स्त्री की उपादेयता को आदमी अगर ईमानदारी-पूर्वक  समझ भर भी ले तो वह इस अपने लिए इस अनिवार्य जैविक के ना होने से होने वाले नुक्सान को समझ पाने में भी सक्षम नहीं है क्या यह सभ्य-सु-संस्कृत सु-शिक्षित आधुनिक इन्सान..??!!अगर हाँ,तो समस्या का निदान नहीं ही है,ऐसा ही समझिये...मगर मैं तो यह जोड़ना चाहूंगा कि ऐसे आदमी को गधा कहना गधे का भी अपमान होगा....आप क्या कहते हैं दोस्तों....??कुछ आप भी कहिये ना..??    

--
http://baatpuraanihai.blogspot.com/

शनिवार, 24 सितंबर 2011

हैप्पी बर्थ डे आल ऑफ़ टू यू..............

मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!
हैप्पी बर्थ डे आल ऑफ़ टू यू
दिन बदलते हैं....
कुछ बदलता सा दिखाई देता है....
मगर कुछ बदलता सा नहीं होता...
बस थोड़ा सा हम बदल जाते हैं....
एक दिन और बढ़ जाते हैं....
एक कदम और मृत्यु की और ले जाते हैं 
दिन बदलते जाते हैं...
और हर एक दिन के साथ 
बढ़ा लेते हैं हम 
अपनी कुछ और जिम्मेवारियां....
सर पर बोझ बढाते जाते हैं 
और खुद ही हर दिन 
अपने-आप पर बोझ बनते जाते हैं 
बदलता है ना बहुत कुछ...
हमारा हंसता हुआ चेहरा
उदासी में परिणत हो जाता है 
इस उदासी के बीच 
घर की जिम्मेवारियों के बीच 
किसी एक दिन या कुछेक दिन 
हम हंस लिया करते हैं 
और हो जाया करते हैं बाग़-बाग़ 
ढेर सारी बधाईयाँ पाकर
खुशह हो जाया करते हैं...
जब बहुत सारे लोग करते हैं विश हमें
जन्मदिन तो है ही सबका कोई ना कोई दिन 
मगर हर दिन को खुशियों से जी लें 
अपनी समस्त जिम्मेवारियों के बावजूद 
अपने तमाम दुखों और पीडाओं के बाद भी 
तो दोस्तों...इस जीवन का कोई अर्थ है...
है ना दोस्तों मेरे प्यारे दोस्तों....
तो आज मेरे जन्मदिन से 
आप भी अपने-आप से यह वादा करो
कि आप सब खुश रहो हमेशा 
अपने समस्त दुखों-पीडाओं के साथ भी....
ये जो कर्मफल हैं हमारे....
उन्हें नहीं मेट सकता कोई भी....
तो फिर दुखी होना 
जीवन का अपमान करना ही तो है....
आईये हम ख़ुशी मनाये अपने होने की....
आईये मैं देता हूँ.....
आपको अपने आने वाले जन्मदिवस 
की अनंत-असीम शुभकामनाएं....!!   

बुधवार, 21 सितंबर 2011

ये नए मिजाज का शहर है,ज़रा फासले से मिला करो !!

मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!
                    आईआईएम बेंगलुरु की छात्रा मालिनी मुर्मू के आत्महत्या जैसे कदम उठाये जाने से एक बार फिर सोशल-साईट्स में बनाने वाले रिश्तों की गंभीरता पर प्रश्नचिन्ह उठता है,कि बिना-देखे भाले बनाए गए रिश्ते और दोस्ती टिकाउपन के लिहाज से कहीं क्षण-भंगुर तो नहीं...?महज अपनी फ्रेंड-लिस्ट के बड़ा होते जाने को लेकर रोमांटिक होना इस दुनिया का बड़ा शगल है,एक दुसरे के पोस्ट को लाईक करना या उनपर कमेन्ट कर दोस्ती की परिभाषा पूरी नहीं हुआ करती,बल्कि आपसी समझ-और विचारों के आदान-प्रदान द्वारा एक-दुसरे को और-और-और ज्यादा समझते जाना,साथ ही अपनी समझ को विकसित करना भी नेट-दोस्ती की एक महत्वपूर्ण कसौटी बनायी जा सकती है !
                   इंटरनेट पल-भर में अपनी वैश्विक पहुँच के कारण आज ना सिर्फ सूचनाओं के त्वरित पहुँच का कारण और माध्यम बन चुका है बल्कि हरेक व्यक्ति के अपने विचारों के प्रकटीकरण का सबसे सशक्त माध्यम भी बन चुका है,मगर दोस्ती और संवेदना के लिहाज से यह अब भी खासा निरुत्साहित करने वाला है.क्यूंकि दोस्ती के लिए जान लड़ा देने वाली परम्परागत वैश्विक सोच के बनिस्पत यह दोस्ती अब गोया एक खेल बन चुकी इस माध्यम में....!!और यही इस माध्यम सबसे क्रूर सत्य है !!एक-दुसरे से कोसों-मीलों दूर बैठे लोग जब एक-दुसरे से दोस्ती गांठने का उपक्रम करते हैं तब उनमें कैसी और कितनी समझ होती है एक-दुसरे के प्रति, यह एक सवालिया निशान है इस नेट जगत के दोस्तों के बीच....और इस तरह के मुद्दों के मद्देनज़र हम सबको अपने भीतर भी टटोलना चाहिए कि हम इस दोस्ती में कहाँ तक ईमानदार है...??
                   वरना एक तरफ तो हो सकता है कि आपके विचारों या आपकी बातों से प्रभावित होकर या आकर्षित होकर कोई आपको अपना दोस्त-प्रेमी-प्रेयसी या कुछ भी बना डालता हो,जबकि आप सिर्फ शब्दडाम्बर रच रहे होंओ....महज एक खेल खेल रहें होंओ....या फिर इसका उलटा भी होओ....कि सामने वाला यही कर रहा हो आपके साथ....!!ऐसे में तो इस नयी दोस्ती से किसी भी प्रकार की अपेक्षा करना भी बिलकुल व्यर्थ है और इससे यह सन्देश भी ध्वनित होता है कि इस तरह की सोशल साईट्स में जाकर दोस्त "निर्मित" करने वाले लोग दोस्ती को दोस्ती के अर्थ में ना लें !!(जहां वाकई लोग दोस्त ही हैं,उनकी बात मैं नहीं कर रहा !!)
                     और इस करके वो इस तरह की "दोस्तियों" से कुछ भी अपेक्षा ना रखें !!बल्कि किसी भी "नामालूम"आगत के लिए भी खुद को तैयार रखें...क्यूंकि यह बात सदा ध्यान में रखने योग्य है कि जिस जगह आप दोस्ती कर रहे हो,वह सार्वजनिक है (बल्कि सार्वजनिक पैखाना कहूँ तो ज्यादा बेहतर होगा !!)और जहां बहुत सारे लोग टट्टी-पेशाब की तरह भी दोस्ती कर रहें हैं,जिन्हें पहचाना भी नहीं जा सकता......और इसका खुलासा तो तब हो पाता है जब कोई मालिनी मुर्मू फेसबुक पर अपने बॉय-फ्रेंड के खुद के रिश्ते पर सार्वजनिक रूप से कमेन्ट किये जाने पर आत्महत्या जैसा आखिरी कदम उठा लेती है,जिसे मेरे जैसे लोग ह्त्या मानते हैं....मगर इस तरह के बॉय-फ्रेंड जैसे हत्यारे तरह-तरह के तिकड़मी वक्तव्यों से खुद को बचा भी लेते हैं,क्यूंकि वो दरअसल एक ठग हैं!!                         इसलिए ओ फेसबुकिया दोस्तों सावधान....यहाँ पर हजारों ठग हैं....संभल कर कीजिये दोस्ती....एक शेर तो सूना ही आपलोगों ने....बशीर बद्र का है,कोई हाथ भी ना मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से....ये नए मिजाज का शहर है,ज़रा फासले से मिला करो !!(क्या बशीर जी ने यह सोचा भी होगा कि उनके द्वारा यह लिखे जाने के बाद ऐसी एक वर्चुवल दुनिया पैदा होगी जहां उनका यह शेर बिलकुल सटीक बैठ जाएगा....!!??)  

शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

अभी-अभी जो मैंने पढ़ा....अच्छा लगा....!!

मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!

SUNDAY, SEPTEMBER 11, 2011

जब औरत घर की जिम्मेदारियां ना संभालना चाहे तो क्या करें?

peopleइंसान को जीने के लिए इस दुनिया मैं बहुत कुछ करना पड़ता है. बचपन से बच्चों को पढाया लिखाया जाता केवल इसलिए है कि समाज मैं इज्ज़त से सर उठा के जी सकें. अपनी अपनी सलाहियत के अनुसार हर इंसान अपने रोज़गार का रास्ता चुन लेता है. कोई व्यापार करने लगता है, कोई विज्ञान मैं महारत हासिल करता है तो कोई बैंकिंग मैं और उसी के अनुसार नौकरी कर लेता है. इस प्रकार इंसान का जीवन दो ख़ास हिस्सों मैं बंट जाता है . पहला उसका घर और परिवार और दूसरा उसकी नौकरी या व्यापार.

किसी के पास अच्छा व्यापार या नौकरी है और उसका घर भी अच्छे से चल रहा है तो वो इंसान एक सुखी इंसान कहलाता है.लेकिन इन दोनों सुखों को पाने के लिए इन्सान को बहुत सी कुर्बानियां  देती पड़ती हैं, मेहनत करनी पड़ती है. इसमें औरत या मर्द का कोई सवाल नहीं आता बल्कि जैसा कि मैंने कहा अपनी अपनी सलाहियतो का इस्तेमाल करते हुए करते हुए  औरत और मर्द इन  सुखों को पाने कि कोशिश करते हैं.

यकीनन यदि किसी घर मैं पति और पत्नी दोनों घर पे बैठ के रोटियां  पकाएं , बच्चों की परवरिश मैं ही लगे रहें तो उनको यह सब करने के लिए धन कहाँ से आएगा? और यदि दोनों नौकरी करने लगें तो घर का सुकून ख़त्म हो जाता है क्यों कि केवल धन से ना तो औलाद  की  सही परवरिश संभव है और ना ही शाम के २ घंटो मैं घर को संभालना संभव है.

सबसे बेहतर तरीके से वही घर चलता है जहाँ एक धन कमाने के लिए घर से बाहर जाए और दूसरा घर पे रह ते हुए औलाद की परवरिश और घर तथा समाज के दूसरे कामों को अंजाम दे. कौन किस काम को करेगा इसका फैसला उनकी सलाहियत करेगी ना कि हमारी जिद.

यह औरत ही है जो अपने गर्भ मैं ९ महीने अपने बच्चे को रखती है और जन्म होने पे उस बच्चे को दूध पिलाना होता है. ऐसे मैं बच्चा अपनी माँ से लगा रहता है और वो जैसी  परवरिश करती है वैसा बनता चला जाता है. यह दोनों काम किसी मर्द के लिए करना संभव नहीं यह सभी जानते हैं.ऐसे मैं इस बात कि जिद करना कि हम घर को नहीं संभालेंगे ,बस बाहर जा के धन कमायेंगे कहाँ तक उचित है?

मर्द को ना गर्भ मैं बच्चे रखने हैं, ना दूध पिलाना है. शारीरिक रूप से भी अधिक मज़बूत है तो यदि वो बाहर के काम करे, मजदूरी करे, नौकरी करे ,व्यापार करे तो इसे  ना इंसाफी तो नहीं कहा जा सकता? यहाँ ना तो किसी गुलामी की बात है और ना ही किसी ज़ुल्म कि बात है. यह बात   है पति और पत्नी के समझोते की जिसके नतीजे मैं दोनों पारिवारिक सुख का अनुभव करते हुई सुखी जीवन व्यतीत करते हैं.

यदि किसी अलग परिस्थिति में या मजबूरी में यह आवश्यक हो जाए कि पत्नी नौकरी करे या ऐसी औरत जिसके  कोई औलाद नहीं, घर पे पड़े पड़े क्या करे तो यकीनन उसे भी अपने  व्यापार मैं साथ देना चाहिए और नौकरी कर के कुछ और धन कमाने कि कोशिश करनी चाहिए.

लेकिन पति कमाने में सक्षम है, व्यापार भी बढ़िया है फिर भी अपने औलाद के प्रति , घर के प्रति ज़िम्मेदारी को महसूस ना करते हुए  बाहर नौकरी करने कि जिद ,या किसी और काम मैं समय गंवाने की जिद क्या घर का सुकून और चैन ख़त्म नहीं कर देगी?

माना कि घर कि जिम्मेदारियों   को निभाना आसान नहीं, घर मैं बंध के रह जाना  पड़ता है , अक्सर बुज़ुर्ग महिलाएं घर की बहु को ना जाने क्या क्या सुना देती हैं, बहुत बार खराब पति होने पे पति की चार बातें घर  की सभी ज़िमेदारियां निभाने   के बाद भी  सुननी भी पड़ती है लेकिन यह हर घर मैं तो  नहीं होता?

क्या नौकरी मैं मर्द को ज़िल्लत का सामना नहीं करना पड़ता? क्या खराब अफसर के आ जाने पे बुरा भला नहीं सुनना पड़ता? यह तो जीवन है जिसमें इस तरह कि बातें होती रहती रहती हैं. इसका बहाना बना के यदि मर्द नौकरी की  ग़ुलामी से भागने लगे और औरत घर मैं रहके अपनी जिमेदारियों को निभाने को ग़ुलामी का नाम देते हुए उस से से भागने लगे तो यकीन जानिए मानसिक शांति जिसके लिए हम सब कुछ करते हैं ख़त्म हो जाएगी.  आज  तरक्की के युग में ऐसे घरों की संख्या दिन बा दिन बढती जा रही है.

ध्यान रहे अकारण जिद घरों को बसाते नहीं उजाड़ देते  हैं. कुछ लोग तो इतने अव्यवहारिक अपनी  जिद मैं हो जाते हैं कि तरक्की के नाम पे महिलाओं को शादी ना करने तक का मशविरा दे डालते हैं.

पति और पत्नी को अपनी जिद छोड़ के अपनी अपनी सलाहियतो, परिस्थियों के अनुसार काम को बाँट लेना चाहिए और सुख से जीवन व्यतीत करना चाहिए. यही वास्तविक तरक्की कहलाती है.
गुरुवार, 1 सितंबर 2011

क्या कोई सुन भी रहा है...???

मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!
क्या कोई सुन भी रहा है...???
"संपत्ति ने मनुष्य का निर्माण नहीं किया है,बल्कि मनुष्य ने संपत्ति ईजाद की है.अपनी जिन्दगी को जितनी सरलता और सहजता से जी सको,जीने की कोशिश करो.अगर आपके पास पैसा है,तो उसे अनावश्यक रूप से खर्च करने के बजाय उन लोगों पर खर्च करो,जिन्हें इसकी जरुरत है."
ये शब्द (किसी संत या) किसी और के नहीं अपितु दुनिया  के सबसे बड़े उद्द्योगपतियों में शुमार "वारेन बफेट"के हैं,जिन्होंने अपनी निन्याबे प्रतिशत सपत्ति तो दान में ही दे डाली है,और उन्होंने desh के अमीरों पर और ज्यादा टैक्स लगाने की वकालत की है,और मजा यह की अनेक धनपतियों ने उनकी इस राय और पहल है तहे-दिल से स्वागत किया है,और राष्ट्र की मदद के लिए ऐसा योगदान करना स्वीकार कर लिया है !!
                  दूसरी और भारत की बात करें तो भारत के धनकुबेर(बल्कि धन पशु कहूँ तो ज्यादा अच्छा होगा!!)टैक्स बढवाना तो दूर,बल्कि तरह-तरह की तिकड़मों से टैक्स बचाते हैं,जहां भी संभावना हो टैक्स की चोरी करते हैं.मगर यह तो हुई सिर्फ चोरी की बात.कारोबार में तरह-तरह की रियायतों के रूप में सरकार से अनेकों छूट भी हासिल करते हैं,अगर आपको यह जान कर कोई ताजूब ना हो तो बताऊँ की अकेले २०१०-२०११ को एक लाख करोड़ रुपये वो इस छूट के रूप में हासिल कर चुकें हैं,तो दोस्तों यह आंकडा आप पिछले दस सालों पर लागू कर दें,तो आप पायेंगे की कितनी अकूत धन-संपदा उन्होंने इस सरकारी चोर रास्ते से प्राप्त कर ली है,जिसे हम-आप-कोई भी नहीं जानता...दूसरी और घाटा-घाटा का विलाप करते हुए इन उद्द्योगपतियों की सरासर मदद करती हुई यही सरकारें गरीब लोगों द्वारा उपयोग की जाने वाली अनेकानेक वस्तुओं पर से लगातार सब्सिडी कम-पर-कम किये जाती हैं !!
                क्या वारेन बफेट के द्वारा उठाये गए सवाल और उनके इस तरह कदमों से भारतीय धनकुबेर कोई प्रेरणा ले पायेंगे...अगर ऐसा हो पाया भारत सचमुच अपने सपूतों से निहाल हो जाएगा....!!!
 
© Copyright 2010-2011 बात पुरानी है !! All Rights Reserved.
Template Design by Sakshatkar.com | Published by Sakshatkartv.com | Powered by Sakshatkar.com.