भारत का संविधान

"हम भारतवासी,गंभीरतापूर्वक यह निश्चय करके कि भारत को सार्वभौमिक,लोकतांत्रिक गणतंत्र बनाना है तथा अपने नागरिकों के लिए------- न्याय--सामाजिक,आर्थिक,तथा राजनैतिक ; स्वतन्त्रता--विचार,अभिव्यक्ति,विश्वास,आस्था,पूजा पद्दति अपनाने की; समानता--स्थिति व अवसर की व इसको सबमें बढ़ाने की; बंधुत्व--व्यक्ति की गरिमा एवं देश की एकता का आश्वासन देने वाला ; सुरक्षित करने के उद्देश्य से आज २६ नवम्बर १९४९ को संविधान-सभा में,इस संविधान को अंगीकृत ,पारित तथा स्वयम को प्रदत्त करते हैं ।"

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इस वतन का भला सोचनेवाले ही असल में देश-द्रोही हैं !!

शनिवार, 19 नवंबर 2011

मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!
            रोज की तरह रोज अखबार पढता हूँ....और इनके माध्यम से अपने आस-पास की अच्छाईयों और बुराईयों से अवगत होता हूँ...कहना ना होगा कि अच्छाईयों से ज्यादा बुराईयों के समाचार ही छाए हुए होते हैं तमाम तरह की ख़बरों में.....ऐसा लगता है कि आदमी ने अपने खुश रहने का माध्यम ही हर तरह की बुराई को बना रखा है...और मज़ा यह कि इसी समाज से इन्हीं बुराईयों के खिलाफ प्रलाप का सूर भी उसी समय बिखरता होता है....पता नहीं क्यूँ हर एक आदमी को अपना किया हुआ सब कुछ सही और किसी दुसरे का किया हुआ वही सब कुछ ना सिर्फ गलत,अपितु नाजायज तक लगता है...ऐसे में इस समाज की सोच की बुनियाद में कोई तुक ही नज़र नहीं आती !!
              अपने इस भारत नाम के देश में जिसे जो समझ में आता है,करता है,जो जहां बैठा है वहीं से भारत का खून चूसता रहता है....इसकी मांस-मज्जा को बड़े चाव से किसी मीट-मुर्गे या बकरी के गोश्त की तरह अपनी जीभ के लार के साथ अपने पेट के भीतर हज़म करता जाता है....जो जहां है,वहीं से व्यवस्था के पावों को काटता जाता है और अव्यवस्था को फैलाने में ना सिर्फ अपना योगदान देता है बल्कि उसे स-उत्साह नयी उमंगें-नयी ऊंचाईयां भी प्रदान करता है !!
            मानव-धन और युवा-बल-धन से परिपूर्ण यह देश अपने ही रहनुमाओं के चुंगल में कसमसाता-छटपटाता रहता है....यह वो देश है जिसके कसीदे पता नहीं कब से गाये जाते रहे हैं....और इस युग में भी नए तरह के गान से इसकी तरक्की का स्वागत होता दीख पड़ता है...मगर समझ ही नहीं आता कि यह देश आखिर है तो है क्या !! कुछ दस-हज़ार या कुछेक लाख अमीर लोगों का एक गाँव....या कि करोड़ों अभीशप्त-बेबस लोगों का एक संजाल मात्र.....!!
            चाँद और मंगल की ओर यात्रा करते हुए इस देश का भविष्य आखिर क्या है ??भूखे-नंगे लोगों से भरे हुए इस देश की भीतरी औकात आखिर है क्या ??काहिलों,कामचोरों और नकारा लोगों से भरे हुए लोग कैसे इसे इसके असली और वांछित मुकाम पर पहुंचाएंगे....??और तो और एक-दम से भ्रष्ट और बे-ईमान इसके रहनुमा इसे आखिर कहाँ लेकर जाना चाहते हैं....??
            बेशक हर जगह की तरह यहाँ भी अच्छाई है....मगर वो इतनी कमतर और क्षीण है कि कोई अच्छी-सी आशा करना भी अब मज़ाक लगता है.....अब सोचने लगा हूँ कि इस वतन का सचमुच भला सोचने वाले और करने वाले ही असल में देश-द्रोही हैं....आमीन....!!
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1 टिप्पणी:

"जाटदेवता" संदीप पवाँर ने कहा…

बेहतरीन लेख लिखा है, बिल्कुल सही कहा/बताया है

 
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