भारत का संविधान

"हम भारतवासी,गंभीरतापूर्वक यह निश्चय करके कि भारत को सार्वभौमिक,लोकतांत्रिक गणतंत्र बनाना है तथा अपने नागरिकों के लिए------- न्याय--सामाजिक,आर्थिक,तथा राजनैतिक ; स्वतन्त्रता--विचार,अभिव्यक्ति,विश्वास,आस्था,पूजा पद्दति अपनाने की; समानता--स्थिति व अवसर की व इसको सबमें बढ़ाने की; बंधुत्व--व्यक्ति की गरिमा एवं देश की एकता का आश्वासन देने वाला ; सुरक्षित करने के उद्देश्य से आज २६ नवम्बर १९४९ को संविधान-सभा में,इस संविधान को अंगीकृत ,पारित तथा स्वयम को प्रदत्त करते हैं ।"

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पैसा ही सब कुछ है......????

शनिवार, 8 नवंबर 2008

पैसे के भीतर ही नंगापन है...जो पैसा आते ही पैसेवाले में दृष्टिगत होता है....बेशक यह सापेक्षिक है....मगर इस सच को झुठलाने की चेष्टा भी भला कितनों ने की है ....????पैसा एक ऐसी अथाह..असीम....अंतहीन...एकदम नंगी...यहाँ तक कि वीभत्सता की हद तक नंगी एक ऐसी वासना है, जिसके लिए आदमी जान तक दे सकता है...और हर पल दे भी रहा है..!!....सरोकार,जिस शब्द की हम जैसे टुच्चे,घटिया और सो कॉल्ड संवेदन-शील लोग दिन-रात ड्रमों आंसू बहते हैं...कलपते हैं...चीखते हैं...चिल्लाते हैं.... इस शब्द से पैसे वालों कोई "सरोकार" नहीं होता...बल्कि उन्हें तो पल्ले भी नहीं पड़ता कि हम जैसे लोग आख़िर कह क्या रहे हैं... या हमारी बातों का मर्म क्या है....अनेकानेक संत महात्मा इसी तरह चीखते-चिल्लाते स्वर्ग सिधार गए मगर आदमी आज तक वैसा-का- वैसा है....अकूत संपत्ति इकठ्ठा करने की उसकी प्यास बढती ही जाती है...भूखी दुनिया का दर्द उसे कतई नहीं सताता... शायद वो बुद्ध की भांति यह जान गया है कि दुनिया दुःख है...और जब बड़े-बड़े महात्मा इसका दुःख दूर नहीं कर पाये तो वह ख़ुद किस खेत की मूली है....सो वह अपनी नित्यप्रति की भूख को ना सिर्फ़ शांत करने की चेष्टा में सतत लगा रहता है...बल्कि उस भूख को और...और...और बढाता जाता है....बढाता ही जाता है..उसका नाम विश्व की बड़ी-बड़ी नामचीन पत्र-पत्रिकाओं में छपता जाता है... हर देश की सरकार उन्हें स-सम्मान बुलाती है..उनकी आवभगत करती है....उन्हें तमाम तरह की छूट देती है..आप हमारे यहाँ आओ...आपको पन्द्रह-बीस साल तक सब कुछ मुआफ...चुनांचे आप यहाँ का सब कुछ लूट लेने को स्वतंत्र हो.....यह तो गनीमत है कि उनके सामने ये सरकारें अपनी पैंट नहीं उतार देतीं, कि लो......मारो....और तमाम देशो के तमाम अखबार-पत्रिकाए उनका नाम यों जपते हैं...जैसे वो उनके माई-बाप...भगवान् सब कुछ हों... इसकी तह में जाएँ तो इस बाबत भी कई खुलासे हो सकते हैं...कईयों की बाबत तो अपन को मालुम भी है...और थोड़ा-बहुत भी जानकारी रखनेवाले जानते हैं...कि यह सब क्या है...मगर क्या फर्क पड़ता है...क्योंकि पैसे-वाले का धर्म पैसा है... और वो पैसे से किसी को भी खरीद सकता है...इस मण्डी में हर कोई बिकने को तैयार है... यहाँ तक कि खरीदने वाला भी अपने बेचे जाने में ज्यादा लाभ देखे तो ख़ुद बिक जाने को तैयार है... वह भी दुनिया की नज़रों में उसका दुर्लभ गुण ही होगा....क्योंकि पैसे वाले का हर काम भी बुद्धिवाला ही तो होता है...पैसे वाले के पास जो बुद्धि है...वो किसी के पास नहीं है.... बिना पैसे वाला दुर्लभ-से-दुर्लभ बुद्धिवाला भी त्याज्य है...हेय है....उसका सम्मान भी दरअसल एक दिखावा ही है...जो समय-समय पर एक विद्वान को अपनी औकात के रूप में दिखायी पड़ता रहता है...तम्हारी औकात ही क्या है.... ये वाक्य ही बाकी की दुनिया के लिए एक पैसे-वाले का एक कूट मगर जहीन वाक्य है...........!!!! .......................राजीव थेपड़ा
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5 टिप्‍पणियां:

शोभा ने कहा…

बिना पैसे वाला दुर्लभ-से-दुर्लभ बुद्धिवाला भी त्याज्य है...हेय है....उसका सम्मान भी दरअसल एक दिखावा ही है...जो समय-समय पर एक विद्वान को अपनी औकात के रूप में दिखायी पड़ता रहता है...तम्हारी औकात ही क्या है.... ये वाक्य ही बाकी की दुनिया के लिए एक पैसे-वाले का एक कूट मगर जहीन
aapka anubhav sahi hai. aaj samaj ki yahi dasha hai. achha likha hai.

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

टका धर्म: टका कर्म: टका ही परमम् पदम्
यस्य गृहे टका नास्ति टकाटक टकायते

bhoothnath ने कहा…

भाई योगेन्द्र जी,आपकी टिप्पणी "टकाटक" भी आपकी रचनाओं की तरह बेतकल्लुफ बन पड़ी हैं.....और हाँ कल रात को आपकी हरियाणा एक्स्प्रेस पर मैं भी अपने पुरे परिवार के साथ चढा था....कई सारे स्टेशन घूमकर हम वापस लौटे...किसी का भी उसमें से उतरने का मन नहीं था....मगर देर रात हो चली थी...इसलिए उतर आए....टिप्पणी की सोचा अपनी ही भाषा यानि हरियाणवी में ही दूँगा...मगर जो काम अभी हो जाए..वही काम है....बाद पर छोड़ी गई चीजें बाद की होकर रह जाती हैं....कभी नहीं आ पाती.....(हम हरियाणा के नारनौल के हैं.......और...और...और...क्या कहूँ....!!

अल्पना वर्मा ने कहा…

satya vachan!ye maaya hai!

Dr. Munish Raizada ने कहा…

नारनौल से आपके होने का पता चलते ही मेरे रोंगटे खड़े हो गए! वैसे तो नारनौल गए 15 साल हो गए, लेकिन अब तो जाना और भी दूभर ही जायेगा! आखिर, भूत नाथ का सामना कोन करेगा! चलिए, मजाक एक तरफ, वैसे मैं www.mifindia.org पर लिखता हूँ, लेकिन नारनौल के प्रेम ने एक और वेब साईट बनाने को मजबूर कर दिया: www.narnaul.org
आप का ईमेल ने मोलने के वजह से यहाँ टिपण्णी लिख रहा हूँ, वैसे आप मुझे इस ईमेल पर संपर्क करें तो प्रसन्नता होगी: pedia333@gmail.com

 
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