भारत का संविधान

"हम भारतवासी,गंभीरतापूर्वक यह निश्चय करके कि भारत को सार्वभौमिक,लोकतांत्रिक गणतंत्र बनाना है तथा अपने नागरिकों के लिए------- न्याय--सामाजिक,आर्थिक,तथा राजनैतिक ; स्वतन्त्रता--विचार,अभिव्यक्ति,विश्वास,आस्था,पूजा पद्दति अपनाने की; समानता--स्थिति व अवसर की व इसको सबमें बढ़ाने की; बंधुत्व--व्यक्ति की गरिमा एवं देश की एकता का आश्वासन देने वाला ; सुरक्षित करने के उद्देश्य से आज २६ नवम्बर १९४९ को संविधान-सभा में,इस संविधान को अंगीकृत ,पारित तथा स्वयम को प्रदत्त करते हैं ।"

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ओ चोखेरबालियों......!!

रविवार, 23 नवंबर 2008




यहाँ आता जाता रहता हूँ....पढता हूँ...महसूस करता हूँ....कमेन्ट नहीं दे पाता.....क्या लिखूं कि जो इन आलेखों के परिप्रेक्ष्य में आंदोलित होता हुआ-सा लगे...क्या करूँ कि आदमी जात...वर्ग...लिंग...धरम...और अन्य विसंगतियों से उबर सके...और इन सब से ऊपर उठ कर एक सुंदर-सा जीवन जी सके....अपने-आप की तो गारंटी लेता हूँ.....मगर जो भी लोग उपरोक्त चीजों...(विसंगतियों) के कारण सबका जीना हराम किए देते हैं....उन्हें किन शब्दों में और क्या तो समझाएं कि सबका जीवन पानी की तरह बह सके...आधी दुनिया का दर्द दूर हो सके....और बाकि की आधी दुनिया ये महसूस कर सके कि इस आधी दुनिया के बगैर उनका गुजारा सम्भव नहीं.....एक दूसरे को सम्मान देने में किसी का क्या "घटता" है है...ये मैं ३८ वर्षों में भी नहीं समझ पाया....कब समझूंगा...सो भी पता नहीं....
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4 टिप्‍पणियां:

नारदमुनि ने कहा…

narayan narayan

Mired Mirage ने कहा…

यदि आप यह महसूस कर पा रहे हैं तो ही यह आधी से काफी कम होती (भारत में तो)दुनिया आपको अपना मित्र मानेगी । इस दुनिया के ब्लॉग्स पर आपका स्वागत ही होगा ।
घुघूती बासूती

shruti ने कहा…

विचार और स्वप्न हर मंजिल की पहली नींव हैं...चलिए आप सकारात्मक तो हैं। अपनी बहन, बीवी, बिटिया और माँ को एक ऊँचा दर्जा दीजिएँगा...उनके सपनों और इच्छाओं को कुम्हलाने नहीं दीजिएगा। बस यही आशा है। यदि एक व्यक्ति उबर गया..तो वो दो को साथ में उबारता है। दो से चार-चार से आठ।

मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर
लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया....

अल्पना वर्मा ने कहा…

aap ki bhaavna ki qadar karte hain aur achchee baat hai ki aap positive soch rahey hain--aadhi duniya mere khyal se achchee hi hai is liye abhi tak duniya tiki hai baqi aadhi bhi sudhar jayegi--shruti ji sahi likhti hain-
aur main bhi yahi sher [kis ka hai??maluum nahin]--'kaun kahta hai aasman mein surakh ho nahin sakta--ek paththar to tabiyat se uchhalo yaron!

 
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