भारत का संविधान

"हम भारतवासी,गंभीरतापूर्वक यह निश्चय करके कि भारत को सार्वभौमिक,लोकतांत्रिक गणतंत्र बनाना है तथा अपने नागरिकों के लिए------- न्याय--सामाजिक,आर्थिक,तथा राजनैतिक ; स्वतन्त्रता--विचार,अभिव्यक्ति,विश्वास,आस्था,पूजा पद्दति अपनाने की; समानता--स्थिति व अवसर की व इसको सबमें बढ़ाने की; बंधुत्व--व्यक्ति की गरिमा एवं देश की एकता का आश्वासन देने वाला ; सुरक्षित करने के उद्देश्य से आज २६ नवम्बर १९४९ को संविधान-सभा में,इस संविधान को अंगीकृत ,पारित तथा स्वयम को प्रदत्त करते हैं ।"

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"साहित्यिका" जी के लिए.........ससम्मान......!!

गुरुवार, 22 जनवरी 2009


कल इक कविता मैंने इक ब्लागर "साहित्यिका" की पढ़ी......और उनको जवाब (टिप्पणी)देने को मन यूँ मचल गया....और जो टिप्पणी दी.......वो इक कविता बन गई.. सन्दर्भ चाँद का था.........और मैंने जो लिखा वो आपको सुनाने को उत्सुक हुआ जा रहा हूँ.......लो जी...........
आकांक्षाएं जिससे अधिक होती है

साथ वही छोड़ कर चले जाते हैं.......

ये दो पंक्तियाँ साहित्यिका जी की थीं उस कविता में .......और मैंने कहा ..... बस इक यही बात मैंने आपकी पकड़ ली है..........और पकड़ कर रखे हुए हूँ....... आप आकर इसे छुडा लें..........सन्दर्भ तो चाँद का ही है ना.........

एक दिन के लिए जाने वाले को बेवफा नहीं कहते.......

बता कर जाने वाले को लापता नहीं कहते........

जिसके जाने का नियत समय मालूम हो....

उसके लिए गमगुसारी करने से क्या होगा...........

और जो बात बिल्कुल ही लाजिमी है,

उसकी बाबत रायशुमारी करने से क्या होगा.....

दूर वाले तो सदा ही लोगों को अपने लगते हैं..........

हाय पास वाले उन्हें कितने निकम्मे लगते हैं....

चाँद क्या है,आदमी का मन,घटता बढ़ता रहता है....

अरे,सामने वाले के दिल को ये परखता रहता है....

इसके घटने और बढ़ने का ओ तुम लोगों ख्याल मत करो.....

जो तय ही,उसके लिए ख्वामखां ही बवाल मत करो........

तारें हैं हज़ार मगर दिल को यूँ कोई भा ना पायेगा....

एक बस चाँद ज़ख्मों पर मरहम लगा कर जायेगा.........!!

और साथ ही साथ नीचे इक रचना इन फोटो वाले सज्जन के लिए लिख डाली........उसपर भी तनिक ध्यान दें जाएँ तो उन जनाब पर आपके बड़े रहमों-करम होंगे...!!मेरे मौला रहमों करम.....मेरे मौला रहमों करम.........आईये इस रचना के ठीक नीचे........और पहचानिये कि ये जनाब कौन हैं.........!!
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4 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

रचना तो बढ़िया है पर फोटो कहाँ है, किसे पहचाने?

हिमांशु ने कहा…

अच्छी रचना. धन्यवाद.

seema gupta ने कहा…

चाँद क्या है,आदमी का मन,घटता बढ़ता रहता है....


अरे,सामने वाले के दिल को ये परखता रहता है....

regards

SAHITYIKA ने कहा…

तारें हैं हज़ार मगर दिल को यूँ कोई भा ना पायेगा....एक बस चाँद ज़ख्मों पर मरहम लगा कर जायेगा.........!!

जी बात तो आपने बहुत खरी कही है.. लेकिन यंहा मैंने एक पूर्णिमा से दूसरी पूर्णिमा तक को पूरा जीवन मान कर कविता लिखी है.. चाँद तो है ही प्यारा.. लेकिन हर किसी को तो नहीं मिल सकता.. इसीलिए तारे तो हमेशा हमारे साथ रहते है .. उन्हें भी नज़र अंदाज नहीं करना चाहिए.. क्योकि ये सब ही मिल कर आसमान को इतना खूबसूरत बनाते है ..

आकांक्षाएं जिससे अधिक होती है
साथ वही छोड़ कर चले जाते हैं.......
जहाँ तक इन पंक्तियों की बात है .. हम अपने दुखो के लिए अधिकांश समय खुद ही जिम्मेदार होते है परन्तु मानते नहीं .. क्यों कि अपेक्षा हम करते है .. लेकिन मानव स्वाभाव ऐसा है कि ये छूटता भी नहीं है ..

 
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