भारत का संविधान

"हम भारतवासी,गंभीरतापूर्वक यह निश्चय करके कि भारत को सार्वभौमिक,लोकतांत्रिक गणतंत्र बनाना है तथा अपने नागरिकों के लिए------- न्याय--सामाजिक,आर्थिक,तथा राजनैतिक ; स्वतन्त्रता--विचार,अभिव्यक्ति,विश्वास,आस्था,पूजा पद्दति अपनाने की; समानता--स्थिति व अवसर की व इसको सबमें बढ़ाने की; बंधुत्व--व्यक्ति की गरिमा एवं देश की एकता का आश्वासन देने वाला ; सुरक्षित करने के उद्देश्य से आज २६ नवम्बर १९४९ को संविधान-सभा में,इस संविधान को अंगीकृत ,पारित तथा स्वयम को प्रदत्त करते हैं ।"

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करैक्टर कहाँ से लायें...........!!.....(२)

मंगलवार, 27 जनवरी 2009

करैक्टर कहाँ से लायें...........!!.....(२)

करैक्टर कहाँ से लायें ...........!!.....2
दोस्तों यह भूत आज फिर हाज़िर है.........कल के उन्ही सवालों के साथ.......!!??दोस्तों मैं आपसे ज्यादा अपने -आप से यह जानने को उत्सुक हूँ कि मैं अपने करैक्टर ...अपनी नैतिकता .....अपनी सामूहिकता को लेकर क्या हूँ .....क्यूंकि आपमें सबसे पहले मैं स्वयम शामिल हूँ ....क्या जो बात मैं आपसे पूछना चाहता हूँ .....उसमे तनिक भी सच्चाई का अंश मुझमें भी है ........??क्या मैं नैतिक हूँ ......??क्या मैं सच्चा हूँ ......??क्या मैं समूह के हितों के लिए अपने हितों का त्याग करने के लिए राजी हूँ .......??दोस्तों ख़ुद के मुहं से जवाब देने में मियाँ मिट्ठू वाली बात हो जाती है ...लेकिन मैं आपको बताना चाहता हूँ ...कि अपने जीवन में मैं झूठ का उपयोग ना के बराबर करता हूँ या ना के बराबर ही करना चाहता हूँ .......बेशक झूठ की जरुरत भी पड़ती है मगर वो जीवन के किसी स्वार्थ को पूरा करने के लिए नहीं ......बल्कि यूँ ही कभी बच्चों को बहलाने के लिए या ऐसी ही कुछ छोटी-मोटी बातों के लिए .......!!
...........और व्यापार में भी झूठ बोलना पड़ता है .....क्यूंकि आप किसी को ५० रूपये की चीज़ के दाम ४० भी बताएँगे तो ग्राहक को वो ज्यादा ही लगेंगे ......सो यह वक्ती जरुरत बन जाती है .........!!.........मगर मैं यह सच्चे दिल से कहना चाहता हूँ .....झूठ का उपयोग मैं कभी किसी का नुक्सान करने ,किसी को नीचा दिखाने .....अपना गैर सामाजिक स्वार्थ पूरा करने .......गैर सामाजिक कार्य करने .........लल्लो -चप्पो करने ........या ऐसे ही किसी उद्देश्य की पूर्ति करने के कतई नहीं करता ....मैंने ये भी देखा है कि........झूठ बोलने वाले .........मिलावट करने वाले ......ग़लत तरीके से चलने वाले .......मेरे मुकाबिल ,मुझसे मीलों आगे निकल गए हैं .......बेशक निकल गएँ हों .....मगर अपने क्षेत्र में .....अपने ही नहीं वरन अन्य जगहों पर भी ,जहाँ हमारा व्यापार चलता है .....वहाँ मेरी बात का अलग ही महत्व है .....मेरी साख ...व्यापार इन मगरमच्छों के मुकाबिल कहीं बहुत -बहुत -बहुत ज्यादा है .....बेशक व्यापार में पैसा बोलता है ....और नकद पैसों से ,नोटों की गड्डियों से चीज़ों के भाव तुडवाये जातें हैं......मनमाफिक चीज़ें बनवाकर अनापशनाप मुनाफा भी पेला जाता है.....और यहीं पर मैं आप सबसे यह पूछना चाहता हूँ की जब आप व्यापार में अनंत मुनाफाखोरी करते हो.....और नौकरी में भी अनापशनाप घूस लेते हो,तो आप किसी दूसरे को ठीक इसी बात के गाली कैसे दे सकते हो... लड़ कैसे सकते हो........??मेरा कहना यही है........कि आदमी की इसी प्रवृति ने समाज को बिल्कुल ही बदजात बना डाला है.....साफ़-साफ़ की गई चोरी या डकैती को तो हम सज़ा के लायक मानते हैं.........मगर इस तरह की कमीनेपंती को हमने जायज ठहराया हुआ है.......और समाज प्रोफिट के लिए पागलों की हद से भी ज्यादा व्याभिचारी हो गया है......जिनका कोई व्यापर नहीं है और जो कोई नौकरी भी नहीं करते.........वो क्या करेंगे......??चोरी...डकैती....ठगी....धोखाधडी...औरतों की दलाली...और भी ना जाने क्या...क्या....!!जब हम किसी भी चीज़ में घूसखोरी करते हैं.....किसी भी चीज़ में इतनी ज्यादा प्रोफिट लेते हैं....जो किन्हीं भी अर्थों में नाजायज हो........तो हम एक तरह से किसी बेरोजगार को इस बात के लिए आमंत्रित करते हैं....कि आ भैया हमने तो तुझे अपनी तरह से लूटा....अब तू हमें अपनी तरह से लूट.........!!दोस्तों अपना पागलपन हर किसी को उचित लगता है....और दूसरों का पागलपन....पागलपन.....!! इस प्रकार जिस तरह का हम समाज बना रहे हैं.....उसमें हम सच्चाई के लिए जगह ही कहाँ छोड़ते हैं....??.......और तिस पर भी अपने उचित और अनुचित ढंग से कमाए हुए धन का फूहड़,नग्न और बेशर्म प्रदर्शन.........??कोई हमें ना लूटे तो क्यों ना लूटे....??जिस प्रकार एक छोटे और कम कपडों वाली स्त्री किसी कामातुर मर्द को आकर्षित करती है.....उसी तरह अनुचित तरीके से कमाया हुआ धन भी इक जरूरतमंद को ललचाता है...आपको लूट लेने के लिए....और इस समाज में तो यह होगा ही....जिसमें हमने व्यापार या नौकरी या किसी भी तरह से समाज के हर सदस्य को अपनी अंतहीन वासना का शिकार बनाया हुआ है......दोस्तों हम क्या चाहते हैं.....और उसके लिए क्या करना चाहिए.....मगर असल में हम क्या करते चले आ रहे हैं....??इस पर तनिक विचार करने जरुरत है............तो आज एक बार फिर हम इसपर विचार करते हैं............कल फिर मिलेंगे इसी बात की अगली कड़ी के साथ.....!!जयहिन्द................!!
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2 टिप्‍पणियां:

seema gupta ने कहा…

भूतनाथ जी कही मिल जाए तो बताना हाँ...

Regards

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बहुत सही लिखा है आपने .इस पर सोचने विचारने की बहुत आवश्यकता है

 
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