भारत का संविधान

"हम भारतवासी,गंभीरतापूर्वक यह निश्चय करके कि भारत को सार्वभौमिक,लोकतांत्रिक गणतंत्र बनाना है तथा अपने नागरिकों के लिए------- न्याय--सामाजिक,आर्थिक,तथा राजनैतिक ; स्वतन्त्रता--विचार,अभिव्यक्ति,विश्वास,आस्था,पूजा पद्दति अपनाने की; समानता--स्थिति व अवसर की व इसको सबमें बढ़ाने की; बंधुत्व--व्यक्ति की गरिमा एवं देश की एकता का आश्वासन देने वाला ; सुरक्षित करने के उद्देश्य से आज २६ नवम्बर १९४९ को संविधान-सभा में,इस संविधान को अंगीकृत ,पारित तथा स्वयम को प्रदत्त करते हैं ।"

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अब हम यहाँ रहें कि वहाँ रहें........!!

गुरुवार, 15 जनवरी 2009

अपने आप में सिमट कर रहें

कि आपे से बाहर हो कर रहें !!

बड़े दिनों से सोच रहे हैं कि

हम अब यहाँ रहें या वहाँ रहें !!

दुनिया कोई दुश्मन तो नहीं

दुनिया को आख़िर क्या कहें !!

कुछ चट्टान हैं कुछ खाईयां

जीवन दरिया है बहते ही रहे !!

कुछ कहने की हसरत तो है

अब उसके मुंह पर क्या कहें !!

जो दिखायी तक भी नहीं देता

अल्ला की बाबत चुप ही रहें !!

बस इक मेहमां हैं हम "गाफिल "

इस धरती पे तमीज से ही रहें !!

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5 टिप्‍पणियां:

विनय ने कहा…

भई हम रोज़ पढ़े जा रहे हैं, दिल के आस-पास जो लिखते हैं

---मेरा पृष्ठ
गुलाबी कोंपलें

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आप भारतीय हैं तो अपने ब्लॉग पर तिरंगा लगाना अवश्य पसंद करेगे, जाने कैसे?
तकनीक दृष्टा/Tech Prevue

Udan Tashtari ने कहा…

बड़े दिनों से सोच रहे हैं कि
हम अब यहाँ रहें या वहाँ रहें !!

-जहाँ मन रमे, वहाँ रहें मगर लिखते रहें!!!

seema gupta ने कहा…

" रहने के लिए सोचना कैसा , जहाँ सुकून मिले एक पल को वहां रहें.."
Regards

Amit ने कहा…

jahan man ho wahan reh le sir..

राजीव करूणानिधि ने कहा…

पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है,
अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं.

रहने के लिये कभी सारी कायनात खाली दिखती है, और कभी अपना घर भी अपना नहीं लगता है.

 
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