भारत का संविधान

"हम भारतवासी,गंभीरतापूर्वक यह निश्चय करके कि भारत को सार्वभौमिक,लोकतांत्रिक गणतंत्र बनाना है तथा अपने नागरिकों के लिए------- न्याय--सामाजिक,आर्थिक,तथा राजनैतिक ; स्वतन्त्रता--विचार,अभिव्यक्ति,विश्वास,आस्था,पूजा पद्दति अपनाने की; समानता--स्थिति व अवसर की व इसको सबमें बढ़ाने की; बंधुत्व--व्यक्ति की गरिमा एवं देश की एकता का आश्वासन देने वाला ; सुरक्षित करने के उद्देश्य से आज २६ नवम्बर १९४९ को संविधान-सभा में,इस संविधान को अंगीकृत ,पारित तथा स्वयम को प्रदत्त करते हैं ।"

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अब यहाँ और नहीं....बस....!!

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2008

................हा॥हा।हा...हा॥हा.....आज से इस जगह पर वीराना छा जाएगा......और सन्नाटा गूंजेगा.....सरसराती हुई हवा गुजरेगी....और इस खाली हुई जगह पर धूल का बवंडर उडाती हुई घूमा करगी.....यहाँ अब भूतनाथ कदमताल नहीं करेगा....!!..........उसकी इक आहट तक सुनाई नहीं देगी.....यहाँ जो भी आएगा....यही सोचेगा की ये काला-काला ब्लॉग......बिचारा भूतनाथ....अच्छा हुआ जो दुःख-भरी दुनिया से चला गया....और रहता तो हमारी तरह और रोता....बताऊँ क्यूँ जा रहा हूँ.... नहीं बताता जाओ.....!!कुछ लिखने से भला क्या बदलता है....?? और कौन मोटिवेट होता है.......??कौन बदलता है.......??तो क्या लिखना सिर्फ़ स्वांत-सुखाय भर होता है.....कल्पना की उडाने....या करुणा के भाव.....या यथार्थ से उपजी बेबसी.....या अपनी ही कोई पीड़ा......??....बदलाव अगर इतना ही आसां होता तो कितने ही बुद्द-पुरूष इस जहाँ से गुजर गए.....दुनिया मगर वहीं-की-वहीं ही है.... रत्ती भर भी बदली क्या.....??....साधनों के हिसाब से ....जरुरत के हिसाब से....या स्वार्थों के हिसाब से कुछ बदलाव अवश्य दिखलाई पड़ते है....मगर हकीकत में समाज की मानसिक दशा जानवरों के समान ही रहती है.......किसी को पीड़ा....किसी से हिंसा.....किसी की हत्या.....किसी से व्यभिचार.....किसी पर अत्याचार.....क्या यही है संसार......??अपनी ही बात बताने और मनवाने की थेथरई....और ना मानने पर दिखायी देता अपना कोई और ही विकृत रूप....गंदा और घृणित चेहरा.....पैसे और ताकत का चारों और वर्चस्व......सच्चाई का घुटता गला....कमज़ोर लोगों से जानवरों सा बर्ताव....और गधों सा कार्य लेना....क्या यही संसार है....ऐ भूतनाथ...तू यहाँ कर रहा है यार.....चल यार चल यहाँ से.....अबे तेरा यहाँ क्या काम है.....??भूतनाथ को मौत आवाज़ देती है.....मगर आम आदमियों की तरह भूतनाथ भी मुंह लटकाकर वही एक रटा-रटाया जवाब देता है.......अभी ज़रा रूक ना.....बीवी हैं.....बच्चे हैं....उनका क्या होगा....??रोने लगता है भूतनाथ.....ऐ मौत ज़रा रूक जा ना.... ऐ मौत ज़रा रूक जा ना.....जरा बीवी-बच्चों की परवरिश का सही हिसाब-किताब बिठा दूँ.... फ़िर आ जाना ना.....प्लीज़....मौत पलट जाती है...किसी छोटे से-प्यारे से आज्ञाकारी बच्चे की तरह.....समय बीतता चला जाता है...आवश्यकताएं....बढती चली ही जाती हैं....सपने सारे हवा में चमगादडों की तरह उल्टे लटक जाते हैं जिंदगी-भर के लिए.....!!जिन्दगी में लोग आते-जाते रहते हैं....मगर इक सन्नाटा सायं-सायं.....बजता ही रहता है......चारों तरफ़ नफरत....लडाई झगडों की कायं-कायं....हर मोड़ पर तरह-तरह के झगडे-झंझट.....हर जगह अंहकार की धमक....और हर जगह आगे जाने के लिए एक पीड़ा भरी प्रतिस्पर्धा......!!....ख़ुद के जीने के लिए बाकी सबका सत्यानाश......क्या यही संसार है.....ऐ भूतनाथ....अरे चल ना यार.....चल....क्या करेगा तू यार यहाँ....जाने कितने लोग यहाँ जाने क्या-क्या कहते हुए चले गए....तू किस खेत की मूली है बे.......??माहौल कुछ बदला तो फ़िर आ जायेंगे.................तो भई...अपन तो चले....कुछ होने को....ना हाने को....हम क्यूँ रहे यहाँ बात बनाने को.....!!कायरों की फौज थी वो तो....हम बेकार ही गए वां जान लड़ाने को....!!.....इक धनुष तो पकड़ना आता तक नहीं.....और चले हैं तीर चलाने को.....!!...अगरचे हम सब बच्चों की तरह हो जाएँ.......चलो ना चले अल्ला को समझाने को....!!अबे गर्दन रेत कर रख देंगे ये तिरी........बड़ा चला है जोश में हाथ मिलाने को....!!दुनिया देखकर जब अल्ला भी मर गया....मियाँ "गाफिल" ही गए उसे जिलाने को.....!
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6 टिप्‍पणियां:

प्रकाश बादल ने कहा…

आप कह तो ठीक ही रहे फर्क कोई नहीं पड़ता लेकिन आप जो लोगों को जगाने का काम कर रहे हैं वो बेहद सराहनीय है और अगर एक बी आदमी बदले तो समझिये काम पूरा धीरे-धीरे सब सीधा होगा। आप कहीं न जाओ भूत नाथ

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत बढिया पोस्ट लिखी है।लेकिन कह्ते है ना ,उम्मीद पर दुनिया कायम है।इस लिए कोशिश जारी रहनी चाहिए।

seema gupta ने कहा…

आज से इस जगह पर वीराना छा जाएगा......और सन्नाटा गूंजेगा.....सरसराती हुई हवा गुजरेगी....और इस खाली हुई जगह पर धूल का बवंडर उडाती हुई घूमा करगी.....यहाँ अब भूतनाथ कदमताल नहीं करेगा....!!
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विनीता यशस्वी ने कहा…

ummid to rakhni hi chahiye. waise bhi itni mehnat se kiye hua kaam ka prinaam bhi achha hota hai

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

वैसे आपने तो हमारे दिल की बात कह दी। सीधे साधे शब्दों से जिदंगी के बड़े सवाल कह दिये। मैं इसको कई बार पढ गया। वैसे दोस्त आपने पिछले संडे का जनसता पेपर पढा हैं या नही। जहाँ बताया गया कैसे कुछ लोगो ने "गाँधी की आत्मकथा" पढ कर अपने आप को बदल दिया। वैसे आखिर में यही कहूँगा कि हमारा फर्ज है कर्म करना और बाकी समय पर छोड़ देना।

sajal ने कहा…

janaab hindi blogging ki duniya mein Ranchi ka naam dekhke khincha chalaa aaya hai

aur aisa kamaal ka blog dekhke badi khushi huyee..aapne humare antarman ko is lekh se chhhua,aapka uddeshy poora hua..yakeenan kuch logo par iska asar to hoga..to bas aapki ye baatein ki bhoothnaath yahaan ab nahi aayega,umeeed karoonga aisa nahi hoga kuchh :)

sirf hungama khadaa karna mera maksad nahi,
shart ye hai ki tasveer badalni chhaiye..

likhte rahiye...

 
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