भारत का संविधान

"हम भारतवासी,गंभीरतापूर्वक यह निश्चय करके कि भारत को सार्वभौमिक,लोकतांत्रिक गणतंत्र बनाना है तथा अपने नागरिकों के लिए------- न्याय--सामाजिक,आर्थिक,तथा राजनैतिक ; स्वतन्त्रता--विचार,अभिव्यक्ति,विश्वास,आस्था,पूजा पद्दति अपनाने की; समानता--स्थिति व अवसर की व इसको सबमें बढ़ाने की; बंधुत्व--व्यक्ति की गरिमा एवं देश की एकता का आश्वासन देने वाला ; सुरक्षित करने के उद्देश्य से आज २६ नवम्बर १९४९ को संविधान-सभा में,इस संविधान को अंगीकृत ,पारित तथा स्वयम को प्रदत्त करते हैं ।"

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इस थोडी-सी बिना पढ़ी-लिखी जगह पर......!!

रविवार, 7 दिसंबर 2008




एक ऊँचे से ताड़ के पेड़ पर........घने पत्तों वाली लम्बी डालियों के बीच.......थोडी-सी जगह पर.......खेल रही हैं कुछ गिलहरियाँ......फुदकती....उछलती..... मचलती.... दौड़ती....भागती......जरा-सी ही जगह पर........बिना लड़े और झगडे....मिल-जुल कर खेल रही हैं ये बिना पढ़ी-लिखी ये गिलहरियाँ.......!!
......................कई पेड़ हैं एक साथ खड़े हुए.....थोडी-सी ही जगह पर.......एक दूसरे के साथ हँसते और गपियाते हुए......तरह-तरह के पत्तों वाले.....तरह-तरह के फूलों वाले.....सदियों से ये एक ही साथ रहते हुए.....जीवित और स्पंदित....बिना पढ़े-लिखे पेड़......!!
..................इसी थोडी-सी ही जगह में.......कई तरह के पंछी.....कई तरह के जीव-जंतु....बरसों से साथ-साथ ही रहते हैं.......हिल-मिल कर....खेलते-खाते....हँसते- बतियाते......अपनी उम्र पूरी करके मर जाते.........मगर किसी ने भी आज तक यह नहीं कहा..........हमारी है....या हमारे बाप-दादा की है......या हमारे बाद यहाँ रहेंगे हमारे बच्चे........बिना पढ़े-लिखे ही.........!!
......................कितने ही मौसम बदलते हैं.......बदले हैं.......मौसमों के साथ फल-फूल भी....जीव-जंतु भी.....मगर माहौल तनिक भी नहीं बदलता.......वैसा ही बना रहता है....तरो-ताज़ा......सदाबहार.......हरा-भरा.....खुशनुमा.......!!......टी.वी.पर एक मिनट में दर्जनों चैनल बदलते हम.........यहाँ एक ही दृश्य को देखते मिनट-घंटे-दिन तो क्या.....इक पूरी जिन्दगी ही निकाल दें........एक ही दृश्य को निरखते हुए......!!
.............................बिना पढ़े-लिखे पहाड़.....बिना पढ़े-लिखे जीव-जंतु.....बिना पढ़े-लिखे पेड़.......और बिना पढ़ा-लिखा आसमा.....रह रहे हैं इसी बिना पढ़ी-लिखी पृथ्वी पर......आपनी-अपनी जगह पर.....बिना एक दूसरे का अतिक्रमण किए हुए.....बिना एक-दूसरे से झगडे हुए........किसी के बाप-दादा की नहीं हुई ये ज़मीन..........किसी ने भी इसे कभी अपना भी नहीं कहा........मगर जमीन का बिना इक छोटा-सा टुकडा खरीदे हुए भी........पृथ्वी को जिया है इन्होने अपनी आत्मा की तरह.......धरती के हर इक स्पंदन को......इन्होने जिया है अपनी हर-इक आती-जाती साँस की तरह........!!
.................गिलहरियों का खेल अभी तक चल ही रहा है.........इस पेड़ से उस पेड़....इस डाली से उस डाली.........पंछी आ-जा रहे हैं उड़-उड़ कर वापस अपनी ही छोटी-सी जगह पर.......और आश्चर्य तो यह है कि तरह-तरह के ये पेड़-पौधे.....पक्षी....जंतु.....पहाड़....नदी....आसमा....धरती......सब समझते हैं एक-दूसरे की भाषा.....बिना पढ़े-लिखे ही.....!!
.................यहीं पास ही खड़ी हुई हैं......कुछ निर्जीव बिल्डिंगे.......और बनने को तैयार हैं कुछ और नई भी......कई प्लाट तो काट लिए गए हैं.....और कुछ काटे जाने वाले भी हैं.......इसी थोडी-सी जगह पर हैं......ऊपर बताये गए पेड़....पहाड़.....जंतु....पंछी.....नदी....और ख़ुद यह जमीन भी......!!..........!!........!!
..............बस कुछ ही समय में ख़त्म हो जाने को हैं....ये बिना पढ़े-लिखे लुभावने दृश्य........!!.......!!
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9 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

prayavaran par shighra dhyan dena jaroori hai. Achcha aalekh.

mehek ने कहा…

bahut sundar lekh aur important bhi.insaan khud ke liye ghar bana raha aur ped bagiche kaat raha,to chidia gilhari bhag jayenge,nisarg raksha karni hogi.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

वो गिल्हेरियाँ शायद धर्म नाम की चीज को नही जानती होंगी

अच्छी अभिव्यक्ति, बधाई

डॉ .अनुराग ने कहा…

आज अच्छा लगा आपका ये रूप .....ऐसे ही कुछ ओर लिखे

"SHUBHDA" ने कहा…

जरा-सी ही जगह पर........बिना लड़े और झगडे....मिल-जुल कर खेल रही हैं ये बिना पढ़ी-लिखी ये गिलहरियाँ.......!!
va....h
लगातार चले ये सिलसिला

"अर्श" ने कहा…

bahot hi khub likha hai paryavaran pe ...... dhero badhai aapko sahab..

poemsnpuja ने कहा…

likhne ki shaily badi acchi lagi, aur bhav to khair kya kahne.
bilkul filmm ki tarah chal rahe hain shabd. jab bhi aati hun chakit ho jaati hun. adbhut pratibha ke dhani ho aap. meri dheron shubhkaamnayein. aapke jaisi acchi taarif to karni nahin aati, fir bhi koshish ki hai. :)

BrijmohanShrivastava ने कहा…

मेरा सौभाग्य कि आज ईमेल देख लिया में आपका शुक्रगुजार हूँ जो आपने मुझे इस लायक समझा /सच कहता हूँ खो गया आपके ब्लॉग पर आकर /उधेड़बुन देखा पढ़ा राहुलजी को भी धन्यबाद दिया /फिर दो दिनों पूर्व रचना देखी तस्वीर ध्यान से देखी उसवक्त के माहौल पर सशक्त रचना /भेजदो बूढे माँ बाप को ब्रधआश्रम में पर मेरा निवेदन ये है कि मेरा २९ अक्टूबर २००८ का लेख जो शारदा ब्लॉग पर ही है ""आज की जरूरत ब्रध आश्रम ""पढने की कृपा करे /सबल बड़ा दर्दनाक है पर भी मेरा उक्त ही निवेदन है .मैं बुजुर्गों के ख़िलाफ़ नहीं हूँ ,प्रातकाल उठके ..मात पिता गुरु नावही माथा मुझे याद है / "" हम उन किताबों को काबिले जप्ती समझते हैं कि जिनको पढ़के बेटे बाप को खव्ती समझते हैं ""का मैं समर्थन करता हूँ /ये क्या है सुंदर लगा /थोड़ी सी बिना पढी लिखी को यदि कविता के रूप में लिखा होता लेकिन एक तो वो जगह ज़्यादा घेरती और पाठक बडी रचना देख कर घवराता सो इसे ये आकार दिया अच्छा किया /
सर एक निवेदन और ,आप मेरे ब्लॉग पर अपना (एकाध लाइन की कमेन्ट देकर यूँ ही बढ़िया ,बहुत अच्छा ,हां हां ,ही ही कुछ भी ) लिंक छोड़ दें तो मुझे नित्यप्रति आप तक पहुचने में सहूलियत हो सके /ये एच टी टी पी से दिक्कत होती है /

seema gupta ने कहा…

यहाँ एक ही दृश्य को देखते मिनट-घंटे-दिन तो क्या.....इक पूरी जिन्दगी ही निकाल दें........एक ही दृश्य को निरखते हुए......!!

"what to say..."

 
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