भारत का संविधान

"हम भारतवासी,गंभीरतापूर्वक यह निश्चय करके कि भारत को सार्वभौमिक,लोकतांत्रिक गणतंत्र बनाना है तथा अपने नागरिकों के लिए------- न्याय--सामाजिक,आर्थिक,तथा राजनैतिक ; स्वतन्त्रता--विचार,अभिव्यक्ति,विश्वास,आस्था,पूजा पद्दति अपनाने की; समानता--स्थिति व अवसर की व इसको सबमें बढ़ाने की; बंधुत्व--व्यक्ति की गरिमा एवं देश की एकता का आश्वासन देने वाला ; सुरक्षित करने के उद्देश्य से आज २६ नवम्बर १९४९ को संविधान-सभा में,इस संविधान को अंगीकृत ,पारित तथा स्वयम को प्रदत्त करते हैं ।"

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एक बात कहनी थी आपसे...कहूँ...??

सोमवार, 15 दिसंबर 2008


आप लाजवाब लिखते हो साहब....मगर ये इस ग़ज़ल में वो बात नहीं......जो बात...........आप समझ गए होंगे.....हम सबको सिर्फ़ बढ़िया है...और एक-दूसरे को बधाई ही देने से फुर्सत नहीं मिलती....मजा यह कि हर ब्लागर की हर रचना श्रेष्ट ही होती है.....मगर यह सच भी नहीं होता.........अब ब्लॉग जगत में इस बात की गुन्जायिश जरूरी हो गई है....कि रचनाओं पर सच में ही सारगर्भित टिप्पणियां हों...ना कि सिर्फ़-व्-सिर्फ़ प्रशंसा के भाव...........आपकी रचनाएँ बड़ी अच्छी होती हैं... मगर सारी तो किसी की भी अच्छी नहीं हो सकती.....फिर कुछ ऐसे भी तो हैं...जो वाकई बहुत लाज़वाब नहीं लिखते....मगर उनकी भी वैसी ही प्रशंसा हम पाते हैं... क्यूँ भाई....एक कम अच्छी रचना को आप जरुरत से ज्यादा सम्मान देकर क्या आप उसकी भलाई करते हो....??नहीं ये उसका नुक्सान ही है....वो कमतर चीजों को भी अच्छा ही मान लेगा....और उसका टेस्ट शुरुआत से ही कमतर रह जायेगा.....!!.......प्रशंसा अच्छी बात है.....मगर औसत चीज़ के बारे में उचित ढंग से बताया जाना ज्यादा अच्छी प्रशंसा होगी...वो किसी नए...किंतु समझदार लेखक के लिए उसके हित का साधन भी बनेगी....और गैर समझदार अगर अनावश्यक रूप से उसे तूल दे...दे....तब भी कई ब्लागरों द्वारा उसे समझाया जाना मुमकिन है.....अमूमन तो सभी आए दिन अपनी पोस्ट प्रकाशित करते हैं....मगर वो हमेशा ही अपने "स्वामी" के स्तर की हो ही....ये कतई जरूरी नहीं.....हम सब लेखक भी हैं और अपने ही प्रकाशक भी.....यानि कि हम सब अकेले-अकेले भी मिडिया की इक-इक इकाई हैं....मिडिया के अंकुश में रहने की बात तो हमने कर दी....मगर हम पर किसका अंकुश है...??और अंकुश-हीन हम प्रकाशक-ब्लॉगर-लेखक जो स्तरीयता की मिसाल बन सकते हैं अपनी हड़बड़ी में...........रचनाओं को पेलने की अपनी घनघोर शौकीनी में ख़ुद अपनी-.....हिन्दी की-.......ब्लागर-जगत की-.....और हिन्दी- साहित्य का ही नुक्सान ना कर बैठें....!!हर रचना तो प्रेमचंद...ग़ालिब....मीर......आदि-आदि-आदि की भी जबरदस्त नहीं हुई थी.........हम किस खेत की मुली हैं....?? भाईयों .... इसे आप अपने ऊपर मत ले लीजियेगा.....आज तो बस इक विचार आ गया....जो जाने कब से मन में घूमता रहा है....आज संयोग-वशात मन से बाहर निकल पड़ा...वो भी आपकी रचना पर कमेन्ट के रूप में....सच में तो मैं आपसे बड़ा छोटा हूँ....मगर क्या करूँ आपने ख़ुद ने अपने लिए मानदंड काफ़ी ऊँचे बना लिए हैं... वैसे मेरा कमेन्ट आप-पर है भी नहीं...ये मुझ-सहित सब पर पूरी शिद्दत के साथ लागू होता है..........कम-से-कम उन सभी पर जो ब्लागरों में अत्यन्त लोकप्रिय हैं... सभी नए आने वालों को सही बात बताना बड़ों का कर्तव्य है...बिना अपनी बदनामी वगैरह की बाबत सोचे हुए...बदनाम होकर भी यदि कुछ अच्छा हो जाए तो यह ठीकरा आज मेरे ही सर....मैं यहाँ सीखने आया था....लेकिन देखा कि यहाँ तो कुछ सिखाया तो जाता ही .....!!नहीं बस रचनाएं ही रचनाये पेली जाती हैं....और अपनी रचनाओं पर टिप्पणियों का आनंद.....!!.....थोड़ा मज़ा तो मैंने भी लिया....मगर वही-वही-वही-वही..........देखते हुए अब ऊब-सी हो रही है...ये इसलिए है...कि सब (मेरे सहित) के सब दीवाने-गालिब-सी पुस्तक शायद आधे साल में ही ठोक देने वालें हैं.....बेशक "दीवान" पर रखने लायक उनमें चार भी ना हों....!!........ यह दुनिया बड़ी अद्भुत है... छोटे-छोटे युवा भी चकित कर देने वाला साहित्य रच रहे हैं.....बेशक साहित्य की अधिकता के कारण बहुत सारी अधबनी..अधूरी...अपरिपूर्ण रचनाएं भी आ जा रही हैं.....अब तक मैं ख़ुद भी इसमें शामिल रहा हूँ.... मगर अब और नहीं...!!.......सोचना भी जरुरी है कि कितना-क्या-और किस हद तक सही है खुबसूरत भी...और समय की आवश्यकता भी......!!....सिर्फ़ तात्कालिक भाव भर ही न हों.....हमारे विचार....!!...बल्कि ऐसे भी हों जो हमें चकित भी करें...और उसी वक्त व्यथित भी... भाईयों आपकी पोस्ट पर हमेशा अच्छा लगा है...मेरी बात को अन्यथा ना ले लेंगे...मुझे आपका प्यार और सुझाव दोनों ही चाहिए....जिसे मैंने बड़ी शिद्दत से एक टिप्पणी में आपसे मांगे भी थे....हम सभी ग़ज़ल के...कविता के....या किसी और विषय के जानकारों को अपनी जानकारी बांटनी चाहिए...मैं ख़ुद तो अनभिज्ञ हूँ....और यहाँ बहुत सारे लोग अद्भुत हैं....वो हम सबका मार्गदर्शन भी करते चलें.....हम जैसे लोग सदा आभारी रहेंगे...सच...हाँ सच.....!!
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11 टिप्‍पणियां:

सुनील मंथन शर्मा ने कहा…

bootnath jee apka yah blog bahut hi pasand aaya.

कविता वाचक्नवी ने कहा…

आपने सही विषय उठाया और यह खतरा भी कि कई लोग आप से नाराज़ हो जाएँगें। किन्तु यह उन सभी के वस्तुत: हित में ही है कि उन्हें अपना स्तर तो पता होना चाहिए।

हम लोग कहा करते हैं या बल्कि कहना चाहिए कि समीक्षा में एक कथन प्रचलित है - " जिसकी हत्या करनी हो उसे खूब चढ़ाओ" अर्थात् वह जीवन भर जिन्दा तो रहेगा, अपने को महान लेखक भी समझता रहेगा, फूल कर कुप्पा भी बना रहेगा और इसी छद्म में जीवनभर रहेगा. जबकि उसका लेखन् सदा दोयम् दर्जे का रहेगा और वह कभी किसी को टक्कर देने वाला लेखक नहीं बन सकेगा।

दूसरों का पता नहीं, परन्तु ऐसी प्रशंसा लेने व देने से परहेज ही बरतती हूँ, जीवन के ऐसे अनेक अनुभव व अवसर हैं कि जरा सा किसी को एक शब्द भी सुधार का कह दें या उनकी गलती बता दें तो लोग दुश्मन हो जाते हैं, वे यह नहीं समझते कि ऐसा करने वाला हर व्यक्ति अहमन्य नहीं होता व कभी कभी कभी कड़वी दवा का पीना-पिलाना हितकर होता है। इसीलिए कहा गया था - निन्दक नियरे राखिए।

खैर, बात लम्बी हो गई। कुल मिलाकर, सही परिप्रेक्षय में विषय के पारंगत द्वारा की गई हर आलोचना का स्वागत होना चाहिए। और प्रंशसा विष के समान है।

हिमांशु ने कहा…

टिप्पणियों से विरक्ति हो जाना अस्वाभाविक नहीं है आपका. इनकी मोनोटोनी से अपने भले बुरे का पता तो आप लगा ही नहीं सकते.

अब खयाल करिये कि यह आवश्यक काम की तरह की जाने वाली टिप्पणियों को देने का प्रचलन अभीं और बढ़ने वाला है. आशीष जी ने टिप्पणियों को गिनने का हथियार जो थमा दिया है. ज्ञान जी भी अपनी टिप्पणियों का आंकड़ा बता कर कितना खुश थे?

एक और बात कहनी थी कि अपनी इस छोटी ब्लोग-लेखन यात्रा में मैंने टिप्पणियों को देने लेने से उपजे तोष का उदाहरण भी देखा है .हमारे बडे़ चिट्ठाकार क्षमा करें पर वह भी एक पंक्तियों से ज्यादा फ़ौरी टिप्पणियों को देने के अलावा और क्या करते हैं . यह बात अलग है कि उनकी इन्हीं टिप्पणियों के लिये हम ब्लोगर्स के बीच मारा-मारी है.

टिप्पणी लेने-देने की इस म्यूचुअलिटी से मुझे परेशानी होती है, हां एक सन्तोष तो होता है कि इसी बहाने लोग एक दूसरे के ब्लोग पर पहुंचते तो हैं.

यह बताना जरूरी है कि आप की इस पोस्ट पर सबसे उपयोगी और ईमानदार टिप्पणी मिल चुकी है- कविता जी की . एक ईमानदार ब्लोगर का आपकी इस पोस्ट पर आना सुखद लगा .

नारदमुनि ने कहा…

ARE, JANAB HAM TO YAHAN TAK LIKHTE HAIN HAIN " MAIN AAPKE YAHAN AAYA HUN AAP MERE BLOG PAR AANA" YAH TO ADLA BADALI HO GAI. NARAYAN NARAYAN

seema gupta ने कहा…

कहानी को कहनी करें ..

regards

bhoothnath ने कहा…

आप सब आए ................अच्छा.........लगा.........बेबाक....बात भी अगर गहरी हों तो किसी को भी अच्छा लगना लाजिमी ही है....बजे कि बढ़िया है कहने से.....बढ़िया है या ऐसा ही कुछ कहना संवाद नहीं होता.........बस खानापूर्ति होती है....इस संजाल में अगर हम सचमुच संवाद के वाहक बन सके तो यही इंटरनेट की सार्थक उपादेयता होगी.....ना कि सिर्फ़ ख़ुद को व्यक्त करना भर....दोस्तों अब इस मिजाज़ को बदल कर......हम यहाँ अद्भुत परिवर्तन कर सकते हैं...किसको क्या करना है....वो वही समझे.....मैंने अब तक की गई सैकडों टिप्पणियों में शायद ही कोई "बढ़िया है"वाली टिप्पणी दागी है........और आगे भी ना करूँ....!!

bhoothnath ने कहा…

seema gupta ने कहा…
कहानी को कहनी करें ..
........dhanyavaad seemaa ji...maine sudhar kar diya....ok..aur bhi kuch kami ho to jarur bataaye...main turant unhen behatar karungaa....sach...!!

Anil Pusadkar ने कहा…

सहमत हूं आपसे भूतनाथ जी पूरी तरह्।

BrijmohanShrivastava ने कहा…

भूतनाथ जी /क्या कीजियेगा /अखवारों में पत्रिकाओं में लेख भेजते हैं वे फाड़ फैकते हैं अब लिखने का शौक चर्राया हुआ है तो या तो ख़ुद पत्रिका निकालो और मुफ्त में बांटते फिरो / और गो स्वामी जी तक कह गए है की ""निज कबित्त केहि लाग न नीका सरस होय अथवा अति फीका /और जिस में कोई कहदे वाह क्या बात है ,मज़ा आगया तो दिल में मिश्री सी घुल जाती है /आपने एक बात महसूस की होगी जमाने में लेखक बहुत है पाठक कम है

विनीता यशस्वी ने कहा…

Apne mudda to bahut hi kaam ka uthaya hai.

कविता वाचक्नवी ने कहा…

हिमांशु जी,
आपके शब्दों ने मुझे संकोच में डाल दिया है।
क्या कहूँ?
सद्भाव बनाए रखें, बस यही कह सकती हूँ।

आभार!

 
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