भारत का संविधान

"हम भारतवासी,गंभीरतापूर्वक यह निश्चय करके कि भारत को सार्वभौमिक,लोकतांत्रिक गणतंत्र बनाना है तथा अपने नागरिकों के लिए------- न्याय--सामाजिक,आर्थिक,तथा राजनैतिक ; स्वतन्त्रता--विचार,अभिव्यक्ति,विश्वास,आस्था,पूजा पद्दति अपनाने की; समानता--स्थिति व अवसर की व इसको सबमें बढ़ाने की; बंधुत्व--व्यक्ति की गरिमा एवं देश की एकता का आश्वासन देने वाला ; सुरक्षित करने के उद्देश्य से आज २६ नवम्बर १९४९ को संविधान-सभा में,इस संविधान को अंगीकृत ,पारित तथा स्वयम को प्रदत्त करते हैं ।"

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तुम सिर्फ़ इक अहसास हो !!

शुक्रवार, 17 अक्तूबर 2008

तुम सिर्फ़ एक अहसास हो ........
अगर तुम्हें पाना इक ख्वाब है !!
तुम्हारी चूडियों की खनक ,
अगर मेरी जंजीरें हैं....,
तो भी उन्हें तोड़ना फिजूल है !!


अहसास का तो कोई अंत नहीं होता ,
अगरचे ख्वाहिशों का ,
कोई ओर-छोर नहीं होता !!
मौसम के बगैर बारिश का होना ,
ज्यादातर तो इक कल्पना ही होती है ,
कल्पनाओं का भी तो कोई ओर-छोर नहीं होता,
और तुम ...तुम तो खैर सिर्फ़ एक अहसास हो !!


तुम हवाओं की हर रहगुजर में हो ....
तुम हर फूल की बेशाख्ता महक-सी हो ....
साथ ही किसी चिंगारी की अजीब-सी दहक भी....
तुम ख्यालों का पुरा जंगल हो...
और जंगल का हर दरख्त भी तुम हो ....
मगर ,तुम तो सिर्फ़ एक अहसास भर ही हो !!


तुम गहन अँधेरा हो...
तुम अपार उजाला भी हो ...
तुम उदासी की गहरी खायी हो ...
खुशियों का चमचमाता आकाश भी ...
तुम जो भी हो ....


अगर तुम सिर्फ़ इक अहसास ही हो...
तो मुझमें सिर्फ़ अहसास ही बन कर रहो ना...!!!
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3 टिप्‍पणियां:

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत बढिया भूतनाथ जी।

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

behtar bhav bodh ki kavita
badhai

Vivek Gupta ने कहा…

बहुत बढिया

 
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