भारत का संविधान

"हम भारतवासी,गंभीरतापूर्वक यह निश्चय करके कि भारत को सार्वभौमिक,लोकतांत्रिक गणतंत्र बनाना है तथा अपने नागरिकों के लिए------- न्याय--सामाजिक,आर्थिक,तथा राजनैतिक ; स्वतन्त्रता--विचार,अभिव्यक्ति,विश्वास,आस्था,पूजा पद्दति अपनाने की; समानता--स्थिति व अवसर की व इसको सबमें बढ़ाने की; बंधुत्व--व्यक्ति की गरिमा एवं देश की एकता का आश्वासन देने वाला ; सुरक्षित करने के उद्देश्य से आज २६ नवम्बर १९४९ को संविधान-सभा में,इस संविधान को अंगीकृत ,पारित तथा स्वयम को प्रदत्त करते हैं ।"

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लिखने वालों, सावधान....!!आगे खड्डा[गढ्ढा] है !!

बुधवार, 28 अप्रैल 2010

लिखने वालों, सावधान....!!आगे खड्डा[गढ्ढा] है !!
.....कल मैं अपने रूम में बैठी हुई सोच रही थी कि सोचूं तो क्या सोचूं कि अचानक सामने वाले कोने से दो चूहे निकले और एक दूसरे के पीछे दौड़ने लगे...उनका छुपा-छुपी का खेल देखकर मुझे बड़ा मज़ा आ रहा था.........और आखिरकार वो थक-कर एक ओर निढाल होकर पढ़ गए.....
ब्लागर एक :नाईस
ब्लागर दो :बेहद उम्दा
ब्लागर तीन :बेहतरीन प्रस्तुति
ब्लागर चार :बढ़िया लिखा है
ब्लागर पांच :ब्लागजगत में आपका स्वागत है
ब्लागर छः :बेहद अच्छी रचना,आभार
ब्लागर सात :अच्छा लिखती हो आप,कृपया वर्ड-वेरिफिकेशन हटा लो[ताकि ऐसी उम्दा रचनाओं पर मैं बार-बार आकर आसानी से टिपिया सकूँ ]
ब्लागर आठ :........http:////..............................पे अवश्य पधारें
ब्लागर नौ :.........
ब्लागर दस :..........
अभी-अभी अटलांटा से लौटा हूँ मैं....बहुत थक गया हूँ मगर अपनी ट्रैवलिंग का एक्स्पिरिएन्स आप सबसे शेयर करने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूँ ......आपको पता नहीं होगा शायद कि अटलांटा की बरफ एकदम सफ़ेद होती है,झकाझक सफ़ेद और ठोस भी........तो इस तरह बहुत ही रोमांचक रहा मेरा यह सफ़र कभी फुर्सत मिले तो आप भी अटलांटा हो आईये आपको भी बड़ा मज़ा आयेगा.....
ब्लागर एक :नाईस
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ब्लागर नौ :.........
ब्लागर दस :..........
काली खिड़की पर एक हरा सांप रेंग रहा है
तितलियाँ हंस रही हैं/पर्दा हिल रहा है
लगता है कोई तनहा है और रो रहा है
ब्लागर एक :नाईस
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ब्लागर दस :..........
"अपनी बेटी का हाथ मेरे हाथों में दे दिया
उसकी अम्मा ने मुझे मरने से बचा लिया
आज फिर वो बला की ख़ूबसूरत लग रही थी
आज फिर मैंने उसके गालों का चुम्मा लिया
ब्लागर एक :नाईस
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ब्लागर दस :..........
................लिखने वाले धडाधड पैदा होते जा रहे हैं.ब्लागर मंच एक ऐसी जगह हो गया है जहां ठेले वाला,रिक्शेवाला.रेजा,कुली,डॉक्टर,इंजीनियर,अफसर,नेता.
पी.एम्.,सी.एम्.,कलाकार आदि सब के सब एक मिनट के भीतर अपना ब्लाग बनाकर धायं-धायं अपना लेखन पेले जा रहा है,उस लेखन में चाहे वो अपनी योजनायें बताये...चाहे गिनती-पहाडा रटाये,चाहे अपनी दिनचर्या ही क्यूँ ना पढाये कि अपने शौच की प्रक्रिया ही बताने लगे.....मगर क्या है कि हिंदी-लेखन है ना...इससे हिंदी का भला जो होता है...मगर भैया तब तो फिर मस्तराम साहित्य से भी हिंदी का उतना ही भला होता है...बल्कि इसे पढने वाले तो ब्लागरों से निस्संदेह बहुत ज्यादा है....अब ये बात अलग है कि ऐसी हिंदी से हिंदी का क्या भला है यह भी अपन को समझ में आता नहीं...!!
ना व्याकरण,ना लिंग-निर्धारण,ना वचन-संगति,और ना किसी किस्म की "क्वालिटी"ही..............""रात हो गया था हमलोग एक साथ जा रहा था की तभी अँधेरी चंदनी[चांदनी] में /आसमानों में कईएक तारे एक साथ टीमटीमा रहा था कि एक चोर हमको मिले और उन्होंने हमसे सब कुछ को लुट लिया हम तबाह हो गए,बर्बाद हो गए....हम लौट रहे थे खाली हाथ,तलाब का पानी चमचम कर रहा था और उसमे मछलि दौड़ रहा था........ऐसा अद्भुत है यह हिंदी लेखन...जिसे पढ़कर अक्सर सर के बाल और रौंगटे तक खड़े हो जाते हैं....मगर क्या करूँ हिंदी की भलाई के लिए ऐसी ही हिंदी को पढने की विवशता हो गोया...और चिठ्ठाजगत के मेल के थ्रू जब तक मैं इन अद्भुत चिठ्ठों तक पहुँच पाता हूँ....तब तक मुझसे पहले दसियों लोग उपरोक्त टिप्पणियाँ चिपका कर चले जा चुके होते हैं.....
उम्दा-से-उम्दा चीज़ों पर भी नाईस,बेहतरीन,बढ़िया,वाह,सुन्दर....और कूड़े-से-कूड़े पर भी यही नाईस,उम्दा,बेहतरीन,सुन्दर.....यानि कि सब धान साढ़े बाईस पसेरी....और मज़े की बात तो यह है....कि बहुत से वाकई लाज़वाब-से ब्लागों पर कोई जाता तक नहीं...बेशक उनमें अद्भुत और जबरदस्त सामग्री क्यूँ ना हो....!!वहां गलती से तब कोई जाता है जब लिखने वाला खुद किसी ब्लॉग पर टिपिया कर लौटा हो....यह पैकेज-डील यानि कि लेने का देना वाला कारोबार चल रहा है ब्लॉगजगत में...!!हाँ मगर यह है कि ब्लॉगजगत में सभी प्रकार के लिक्खाडों का स्वागत यूँ होता है जैसे हमारी संसद या विधानसभाओं में किसी चोर,उच्चक्के,गुंडे या मवाली का....गोया कि सबसे बड़ा हरामखोर ही यहाँ का सबसे ज्यादा देश-प्रेमी हो !!
कार्य के किसी भी क्षेत्र में कार्य करने के लिए एक न्यूनतम योग्यता....न्यूनतम अहर्ता की आवश्यकता होती है....मगर नेता और लेखक की योग्यता जितनी शून्य हो उतना ही गोया वह सफल व्यक्ति है.....!!यह स्थिति संभवतः भारत के लिए ही निर्मित है.......!!
लिखना तो ऐसा हो गया है जैसे आपने जब चाहा तब "पाद"दिया....जैसे आपके इस अतुलनीय "पाद"से कोई अद्भुत खुशबू आती होओ....या कि कोई विशिष्ट आवाज़.......क्यों भाई लिखना ऐसी भी क्या जरूरी है कि नहीं कुछ जानो नहीं तब भी लिखोगे ही.....!!कि लिखे बगैर तुम्हारी नानी मर जाने वाली होओ....!!कि खुद को व्यक्त नहीं कर पाए तो मर ही जाओगे.....!!क्यों भई तुम्हारे लेखन में ऐसा कौन-सा सरोकार....किस प्रकार की चिंता.....या कौन से सामाजिक दायित्व....या कौन-सी हिंदी की जिम्मदारी झलकती है कि जिसके लिए तुम्हें सराहा जाए कि तुम्हें नमन किया जाये जाए कि स्वागत ही किया जाए....??मगर तब भी तुम्हारा स्वागत है कि तुम तो हिंदी बुढ़िया के अथिति हो....इस तरह उसके देवता हो.....!!तुम्हारा स्वागत है....इसलिए कि तुम भी हमारे ब्लॉग पर आओ....पढो....टिपिआओ....जाओ.....!!
हमने तो वर्ड-वेरिफिकेशन हटा दिया है अब आप भी हटाओ.......
ये सब क्या हो रहा है...समझ ही नहीं आता....मेरे प्यारे लिक्खाडों....प्रत्येक चिठ्ठे पर प्यारी,उम्दा,बेहतरीन,नाईस कहने वालों क्या तुम्हें उबकाई नहीं आती..
....??क्या तुम्हारा जी नहीं मिचलाता....तुम किसी भी भेद-बकरी-मेमने पर महज इसलिए टिपिया आते हो कि वो तुम्हारी फोटो पर क्लिक करके "तुम"और "तुम्हारे" ब्लाग तक पहुँच जाए.......तुम्हारा फोलोवर बन जाए....??......फूलों की कटाई-छंटाई के लिए जैसे माली की दरकार होती है....वैसे ही अच्छी रचना को हम तक पहुँचने में सम्पादक नामक एक खलनायक कि मगर अब तो हर कोई सम्पादक है...मैं चाहे ये लिखूं...मैं चाहे वो लिखूं...मेरी मर्ज़ी.....इस तरह "उम्दा"लिकने वालों का तांता बढ़ता ही जा रहा है...और उससे भी ज्यादा उनपर टिपियाने वाले लोगों की तादाद.....और एक विशाल खड्डा{गड्ढा}तैयार होता जा रहा है जहां फ़िल्टर किया हुआ स्वच्छ पानी और मल-मूत्र सब एक ही जगह समा जा रहा है....क्या अच्छा है...क्या बुरा....इसका भी भेद भी मिटता जा रहा है....कितने अच्छे है ब्लागर लोग,जो ना बुरा देखते हैं...ना बुरा सुनते हैं.....ना बुरा बोलते हैं....कितने विनम्र....कितने प्यारे.....!!
लेकिन मेरे प्यारे बिलागारों इस प्यारे और अनुकूल वातावरण में ही ब्लॉगजगत के सड़ने के बीज पनपने लगें हैं....और अगर तुम सबने ध्यान नहीं दिया तो...हजारों की संख्या के ब्लॉगों में कोई दर्जन ब्लॉग भी ढंग के साहित्य के ढूढने असंभव हो जायेंगे जहां कि तुम्हारा चित्त शांत हो सके...हिंदी कि हिंदी करना अब बंद भी करो...और अभी इसी वक्त से सोचना और करना शुरू कर दो कि किस तरह हिंदी ब्लाग को परिपक्वता मिले....इसे कैसे बचाएं(अरे!!अभी ही तो पैदा हुआ था...!!??)
यहाँ कैसे क्वालिटी प्रोडक्ट को ही बढ़ावा मिले.....यहाँ पर देश-काल-समाज-और यथार्थ से वास्तविक सरोकार रखने वाली चीज़ें पुष्ट हों.....अच्छा मगर अशुद्द लिखने वालों का मार्गदर्शन कैसे हो....घटिया चीज़ों की अवहेलना करनी ही हो....बहुत-सी चीज़ों में तथ्यात्मक गलतियों का निराकार तत्काल ही कैसे हो....ग़ज़ल लिखने वालों को गलतियां विकल्प-सहित कैसे चिन्हित की जाएँ.[गज़लें मैं खुद भी गलत लिखता हूँ....अलबत्ता अपने विषय और दूसरी अन्य बातों के कारण माफ़ कर दी जाती हैं]
यह तो गनीमत है कि ब्लॉगजगत में ऐसे अद्भुत लोग हैं जिनको पढ़ना किन्हीं नाम-चीन लेखकों को पढने से भी ज्यादा सुखद आश्चर्य होता है मगर यह भी तब अत्यंत दुखद हो जाता है जब वो भी किसी ऐरी-गैरी रचना पर वही नाईस-उम्दा-बेहतरीन-सुन्दर की टिप्पणी चेप कर चले आते हैं....कि वो भी भलेमानुषों की तरह उनके ब्लॉग पर आने का कष्ट करें....इस तरह एक अच्छा और उम्दा मंच बन सकने वाली जगह एक कूड़े-करकट के ढेर में तब्दील होती जा रही है....जल्दी ही जिसमें मोती का एक दाना भी खोजना मुश्किल हो जाएगा....इसलिए देवी सरस्वती के हे प्यारे और विनम्र साधकों....इस जगह को सबका शौचालय बनने से बचा लो...तुम्हारी हिंदी का भी कल्याण हो जाएगा.....और तुम्हारे बच्चे जीयें....ऐसी मेरी प्रार्थना है....!!एक बार बोल दो ना प्लीज़.....क़ुबूल.....क़ुबूल......क़ुबूल......! !
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2 टिप्‍पणियां:

राजेन्द्र मीणा ने कहा…

अभी कुछ टिपण्णी करूंगा तो मैं भी उपरवालो के हसीन श्रेणी में आ जाऊँगा ,,,,पर जो भी अपनी आदत से बाज नहीं आऊंगा .....एक साधारण सी टिपण्णी छोड़कर आपको मेरी रचना झेलने बुलाऊंगा .....फिर आप जैसे परम भूत को पकता हुआ देखकर .....सामने के दो दांत दिखाकर मुस्कुराऊंगा .......सबसे कह दूंगा ...आज से इस भूत को रोज सताऊंगा.....

http://athaah.blogspot.com/2010/04/blog-post_1764.html

alka sarwat ने कहा…

सब धान साढ़े बाईस पसेरी....और मज़े की बात तो यह है....कि बहुत से वाकई लाज़वाब-से ब्लागों पर कोई जाता तक नहीं...बेशक उनमें अद्भुत और जबरदस्त सामग्री क्यूँ ना हो....!!

भाई बहुत क्रोध भरा है आपके भीतर ,किन्तु मुझमें ये पागलपन आज के ६ माह पहले हुआ करता था ,अब मैं बस अपना शोध लिख देती हूँ ,टिप्पड़ी तो देखती ही नहीं ,उससे कई गुना ज्यादा तो फोन आते हैं उन लोगों के जो भिन्न भिन्न बीमारियों से परेशान होते हैं ,मुझे अपनी तपस्या सफल लगती है ,जब वे बीमारी से छुटकारा पा कर मुस्कुरा देते हैं ,
वैसे इससे एक नुक्सान तो है ,पहले मैं खूब ब्लॉग पढती थी ,लेकिन लेखन स्टार की गिरावट और सिर्फ अपनी व्यक्तिगत चीजें परोसने वाले लेख पढ़ कर मन हट गया ,
वाकई क्वालिटी सिर्फ ५ % नजर आती है ,शेष तो बस जनसख्या बढ़ा रहे हैं .......
आपका क़ुबूल तो हमने क़ुबूल किया लेकिन ये भी हम पूछेंगे कि हमारा लेखन कहीं हिन्दी की हिन्दी तो नहीं कर रहा ,अगर हम कभी रास्ते से भटकने लगे तो चेताना जरूर क्योंकि अभिमान का क्या भरोसा ..कब मुझ पे कब्जा जमा ले .....

 
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