भारत का संविधान

"हम भारतवासी,गंभीरतापूर्वक यह निश्चय करके कि भारत को सार्वभौमिक,लोकतांत्रिक गणतंत्र बनाना है तथा अपने नागरिकों के लिए------- न्याय--सामाजिक,आर्थिक,तथा राजनैतिक ; स्वतन्त्रता--विचार,अभिव्यक्ति,विश्वास,आस्था,पूजा पद्दति अपनाने की; समानता--स्थिति व अवसर की व इसको सबमें बढ़ाने की; बंधुत्व--व्यक्ति की गरिमा एवं देश की एकता का आश्वासन देने वाला ; सुरक्षित करने के उद्देश्य से आज २६ नवम्बर १९४९ को संविधान-सभा में,इस संविधान को अंगीकृत ,पारित तथा स्वयम को प्रदत्त करते हैं ।"

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अल्पना जी के ब्लॉग से लौट कर.....!!

गुरुवार, 13 जनवरी 2011

हा...हा....हा....हा....हा....दसवीं कक्षा के जमाने में पढ़ा था गुनाहों के देवता को.....एक सांस में उसे पढने के लिए समय ना मिलने के कारण बीमारी का बहाना कर छत पर जा-जाकर पढ़ा करता उसे....कई-कई बार पढ़ा.....और कई-कई बार रोया......और एक बार तो मैं फफक-फफक कर रोया था.....ऐसा था इस उपन्यास का रस...आज सोचता हूँ तो......हा....हा....हा....हा.....हर चीज़ का एक वक्त होता....कहते हैं की मुहब्बत का कोई वक्त नहीं होता.....मगर होता है जनाब होता है मुहब्बत का भी वक्त....जब वो आपके भीतर उफान मार रही होती है.....मगर आपके पास कोई नहीं होता....आब खुद में मुहब्बत से भरे होते हैं.....और बस इंतज़ार कर रहे होते हैं की कोई मिल जाए.....और जब कोई मिल जाता है तो आपके भीतर की सारी मुहब्बत उस पर उड़ेल दी जाती है.....मगर वक्त इंतज़ार भी तो नहीं करता  आपका या किसी और का....सरपट दौड़ता जाता है ....देखते-न-देखते आपके कानों के आस-पास के कोने सफ़ेद हो जाते हैं.....आपके बच्चे तब उस उम्र के हो चुके होते हैं....जब आपने पढ़ी थी गुनाहों का देवता या फिर कोई और  किताब....और आप रोया करते थे....जब आप किसी के लिए तड़पा करते थे....दिल का वो दर्द अब आपको याद ही नहीं आता....मुब्बत एक मज़ाक लगा करती है .....शायद इसीलिए आज आप अपने दिन भूल चुके होते हैं .....शायद...इसीलिए अपने  बच्चों को ऐसी बातों पर डांटा करते हैं...लेकिन सच बाताऊं दोस्तों....अगर वक्त मिल जाए.....और आप अपने काम-काज को तिलांजलि दे सकें....या कुछ देर के लिए भूल कर ही सही...मुहब्बत को पा सकते हैं....मुहब्बत से सब कुछ संवार सकते हैं.....हाँ सच मेरे दोस्तों....सच.....सच्ची.....सच्च.....कसम से....!!! 
अजब है सच यह मुहब्बत 
रहती है दिल में कशमकश...!!
अजब है यह छोटा सा दिल 
हर शै भागता-दौड़ता-सा हुआ...!! 
अजब है हमारे भीतर की बात 
हमसे छुटकारा पाने को व्यग्र....!!
अजब से हो जाया करते हैं हम 
जब कोई मिल जाता है अपना-सा..!!
और अपनों के बीच ही रहते हुए 
हम हो जाते बेगाने सबके लिए...!!
अजब-सा लगता है हमारा चेहरा 
कोई और ही झांकता है उसमें से...!!
तो मुहब्बत से भरे हुए हम सब 
इतनी दुश्मनायी में क्यूँ रहते हैं...!!
गर इश्क आदमी का फन है "गाफिल"
इसमें इतने आततायी क्यूँ बसा करते हैं...!! 



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2 टिप्‍पणियां:

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

प्रेममयी प्रस्तुति.... प्रेम ऐसा ही होता है.....

दीप्ति शर्मा ने कहा…

bahut sunder prastuti
...
mene apke blog ka anusharan kiya h
..

 
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