भारत का संविधान

"हम भारतवासी,गंभीरतापूर्वक यह निश्चय करके कि भारत को सार्वभौमिक,लोकतांत्रिक गणतंत्र बनाना है तथा अपने नागरिकों के लिए------- न्याय--सामाजिक,आर्थिक,तथा राजनैतिक ; स्वतन्त्रता--विचार,अभिव्यक्ति,विश्वास,आस्था,पूजा पद्दति अपनाने की; समानता--स्थिति व अवसर की व इसको सबमें बढ़ाने की; बंधुत्व--व्यक्ति की गरिमा एवं देश की एकता का आश्वासन देने वाला ; सुरक्षित करने के उद्देश्य से आज २६ नवम्बर १९४९ को संविधान-सभा में,इस संविधान को अंगीकृत ,पारित तथा स्वयम को प्रदत्त करते हैं ।"

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भूतों की खबर लीक कर रहा हूँ.......!!!!

रविवार, 7 फ़रवरी 2010

मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!
मेरे प्यारे-प्यारे-प्यारे भाईयों और उससे भी प्यारी बहनों तथा माताओं....एवं अन्य तमाम किस्म के लोगों इधर मेरी इस दुनिया में मतलब भूतों की दुनिया में आदमी की इस दुनिया पर बहुत ज्यादा ही विचार विमर्श हो रहा है.....!!विचार-विमर्श इस बात पर,कि आदमी जो सोचता है,वो बोलता क्यूँ नहीं,और जो बोलता है,वो कभी भी करता क्यूँ नहीं...और जो उसे कभी भी करना ही नहीं होता वो आखिर बोलता भी है तो बोलता ही क्यूँ है....??आदमी आखिर है तो है क्या...!!आदमी को इस धरती में आपस में मिलकर रहने के ढंग क्यूँ नहीं आते,और कहने को तो बड़ा ही बुद्धिमान-विद्वान और ना जाने क्या-क्या बनता है....मगर दरअसल वो तो किसी एक साथ तक रहने के काबिल नहीं....और दुनिया-भर के मिलन की बातें करता रहता है....एक तक के साथ भी उसके झगड़ने की कोई सीमा नहीं है...तिस पर इतनी बड़ी-बड़ी बातें....बाप रे-बाप आदमी है कि क्या है.....??
धरती पर जीने का मतलब आखिर क्या हो सकता है....सुन्दर ढंग से जीने का अर्थ तो प्रेम से ही जीना होता होगा.....है ना....!!मेरे ख्याल से इत्ती सी बात इक इत्ते से छोटे-से बच्चे को भी पता होगी....लेकिन तमाम तरह के अनाप-शनाप ज्ञान को अपने भीतर समेत लेने के बावजूद आदमी की दुनिया में आखिर सही अर्थ में प्रेम क्यूँ नहीं मौजूद है....उसकी दुनिया प्रेम की भूखी क्यूँ है....और उस भूख के बावजूद भी उसकी दुनिया ऐसी मारकाट क्यूँ है....धरती पर ऐसा क्या नहीं है....जो आदमी की भूख और प्यास नहीं मिटा सकता....मगर इस शारीरिक भूख और प्यास से परे भी कुछ ऐसी भूख और प्यास है जो उसे अपने-आप से ना मिलकर किसी और से प्राप्त होती है.... और उसे पूरा करने के लिए यह सारी मारकाट....धोखाधड़ी....बेईमानी....फरेब....और ना जाने क्या-क्या कुछ रचा जाता है.....!!
प्राकृतिक रूप से घटने वाली भूख-प्यास का तो सही इंतजाम भी हो.....मगर इस अहंकार की भूख और प्यास का क्या किया जाए जिसके लिए आदमी इतने-इतने-इतने यत्न करता है....कि उसकी सारी उर्जा इसी सब में नष्ट होती जाती है....यहाँ तक कि यह उर्जा खोकर आदमी यह समझने लायक भी नहीं रहता....कि उसके द्वारा इतना छल-फरेब किये जाने के वास्तविक परिणाम आखिर क्या हुए....तुरत-फुरत तो खैर उसके मन-मुताबिक परिणाम सामने अवश्य दिखाई पड़ रहे हैं....मगर क्या ये परिणाम आदमियत की सेहत के लिए वाकई बेहतर हैं....??
जाति-धरम-रंग-नस्ल-वर्ग और ना जाने किन-किन खांचों में बंटी हुई इस दुनिया में आने वाली नस्ल के लिए कौन से सन्देश छिपे हुए हैं.....हर-इक सेकण्ड पर कहे जा रहे हमारे-झूठ-पर-झूठ....छल-प्रपंच और ना जाने किन-किन बातों से हमारे बच्चे कौन-कौन-सा सन्देश पा रहें हैं.....और जब हम खुद किसी दुसरे के साथ जिस तरह के रंग बदल-बदल कर पेश रहे हैं......तो हमारे बच्चे आगे आने वाली दुनिया में और कौन-कौन से नए रंग बदलेंगे.....??......एक दुसरे से आगे बढ़ने के लिए एक दुसरे को बड़े सपाट ढंग से गिराते चलते हैं...उससे हमारे नए होनहार क्या सीख रहे हैं.....और जब कि आदमी ही उन्हें आदमियत के संस्कार नहीं दे पा रहा है....तो वह क्यूँकर यह अपेक्षा अपने बच्चों से रख पायेगा कि ये बच्चे एक होनहार दुनिया रच भी पायेंगे.....!!
इस विमर्श के बाद भूतों में एकबारगी तो यह राय कायम हुई....कि धरती के सारे आदमियों को क्यूँ ना मार ही डाला जाए....इससे क्या होगा कि सिर्फ आदमी की जात ही लुप्त होगी.....बाकी के सारे प्राणी तो नष्ट होने से बच पायेंगे.....मगर कुछ बुजुर्ग भूतों के बीच-बचाव से यह राय रद्द कर दी गयी.....कि यह काम भूतों का नहीं यह कार्य तो दुनिया के रचयिता है.....जब उसे खुद यह लगने लगेगा कि आदमी के कारण उसकी यह सुन्दर सी सृष्टि नष्ट होने को आई है.....तो वह खुद आदमी को...................!!
करोड़ों भूतों की आम राय कुछेक बुजुर्ग भूतों के कहने पर रद्द कर दी गयी है.....यह खबर मैं राजीव थेपडा नाम का यह भूत जान-बूझ करलीक कर रहा हूँ.....शायद इस बात में आदमी की जात के लिए कुछ पोजेटिव सन्देश छूपे हुए हों.....क्या आदमी यह आवाज़ सुन भी रहा है....क्या आदमी के लिए किसी भी बात के लिए कोई सबक भी है.....क्या आदमी सचमुच एक समझदार जीव है.....क्या सचमुच वह कुछ सीखता भी है......????
इतने प्यार से वो कुछ कहता था
गोया हर्फों से बोसे लेता रहता था !!
मैं भी कहना चाहता था उससे कुछ
और वो मेरे ही मन की कह देता था !!
मेरे भीतर ही निकलता था इक चाँद
और मैं उसे अक्सर चूम लेता था !!
मेरे आस-पास ही बहती थी नदी
मैं तो बस यूँ ही बहता रहता था !!
मैं सोचता था कि उससे कुछ कहूँ
और फिर सोचता ही रहता था !!
पता नहीं क्यूँ मेरे आँगन में "भूत"
"गाफिल"बनकर फिरा करता था !!
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4 टिप्‍पणियां:

Parul ने कहा…

इतने प्यार से वो कुछ कहता था
गोया हर्फों से बोसे लेता रहता था !!
मैं भी कहना चाहता था उससे कुछ
और वो मेरे ही मन की कह देता था !!
मेरे भीतर ही निकलता था इक चाँद
और मैं उसे अक्सर चूम लेता था !!
मेरे आस-पास ही बहती थी नदी
मैं तो बस यूँ ही बहता रहता था !!
मैं सोचता था कि उससे कुछ कहूँ
और फिर सोचता ही रहता था !!
पता नहीं क्यूँ मेरे आँगन में "भूत"
"गाफिल"बनकर फिरा करता था
jawaab nahi..wonderful :)

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

पता नहीं क्यूँ मेरे आँगन में "भूत"
"गाफिल"बनकर फिरा करता था !!
....बहुत खूब,प्रभावशाली!!!!

pukhraaj ने कहा…

जब तक जिन्दा था न जाना क्या पाया मैंने मर कर सोचता है दिल क्या खोया मैंने ....

बेनामी ने कहा…

Interesting read.

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