लिखने वालों, सावधान....!!आगे खड्डा[गढ्ढा] है !!
.....कल मैं अपने रूम में बैठी हुई सोच रही थी कि सोचूं तो क्या सोचूं कि अचानक सामने वाले कोने से दो चूहे निकले और एक दूसरे के पीछे दौड़ने लगे...उनका छुपा-छुपी का खेल देखकर मुझे बड़ा मज़ा आ रहा था.........और आखिरकार वो थक-कर एक ओर निढाल होकर पढ़ गए.....
ब्लागर एक :नाईस
ब्लागर दो :बेहद उम्दा
ब्लागर तीन :बेहतरीन प्रस्तुति
ब्लागर चार :बढ़िया लिखा है
ब्लागर पांच :ब्लागजगत में आपका स्वागत है
ब्लागर छः :बेहद अच्छी रचना,आभार
ब्लागर सात :अच्छा लिखती हो आप,कृपया वर्ड-वेरिफिकेशन...
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बुधवार, 28 अप्रैल 2010
लिखने वालों, सावधान....!!आगे खड्डा[गढ्ढा] है !!
शनिवार, 24 अप्रैल 2010
bhoot ka parichya.....................
मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!
पिघलता जा रहा हूँ, ये क्या हो रहा है मुझे ?
ओ सूरज,मैं आँख-भर नहीं देख पाता तुझे !!
मैंने किसी के दुःख में रोना छोड़ दिया अब
कितने ही गम और परेशानी हैं खुद के मुझे !!
दिन से रात तलक खटता रहता हूँ बिन थके
उम्र गुजरने से पहले कहाँ है आराम मुझे !!
ना जाने किन चीज़ों के पीछे भाग रहा हूँ
उफ़ ना जाने ये क्या होता जा रहा है मुझे !!
किसी जगह टिक कर रोने को दिल है आज
ऐसा क्यूँ हो जाता है अक्सर''गाफिल''मुझे !!..
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मंगलवार, 20 अप्रैल 2010
वागर्थ के सम्पादक के नाम एक पत्र......!!
सेवा में
श्री विजय बहादूर सिंह जी
चरण-स्पर्श
वागर्थ के अप्रैल २०१० के अंक में आपका लेखक जात के प्रति रोष भरा आलेख पढ़ा हालांकि यह आलेख के अनुपात में मुझे एक जीवंत आख्यान लगा...यह आख्यान इस स्वघोषित विद्वानों के बाप लोगों के लिए एक आईना भी है....मगर विद्वता एक ऐसी चीज़ है जिसके कारण एक व्यक्ति अपने-आप को एक स्वयंभू सम्राट समझ बैठता है...ज्ञान के घोर और असीम अहंकार में डूबकर वह अपने-आप को देखना तक छोड़ देता है...अपने बारे में सोचना तो बहुत दूर की बात है,
ज्ञान का अहंकार दरअसल एक तरह से आदमी के...
शनिवार, 17 अप्रैल 2010
चिन्ताएं.......!!
मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!
चिन्ताएं !!
चिन्ताएं-एक लंबी यात्रा हैं-अन्तहीन,
चिन्ताएं-एक फ़ैला आकाश है असीम,
चिन्ताएं-हमारे होने का एक बोध हैं,
साथ ही हमारे अहंकार का एक प्रश्न भी !!
चिन्ताएं-कभी दूर ही नहीं होती हमसे,
अन्त-हीन हैं हमारी अबूझ चिन्ताएं,
जो हमारे कामों से ही शुरू होती हैं,
और हमारे कामों के बरअक्श वो-
हरी-भरी होती जाती हैं या फ़िर,
जलती-बूझती भी जाती हैं !!
एक काम खत्म तो दूसरा शुरू,
दूसरा खत्म तो तीसरा शुरू,
तीसरा………
हमारे काम कभी खत्म ही नहीं होते,
और उन्हीं की एवज में खरीद ली जाती हैं,
कभी ना...
गुरुवार, 15 अप्रैल 2010
बेचैन आत्मा के ब्लॉग से लौटकर..!!

सचमुच आप भी बड़े बेचैन ही हो....शायद इसलिए ये नाम आपने अपना रखा हो....मेरी समझ नहीं आया कि अपनी बेचैनी का क्या करूँ....और कैसे व्यक्त करूँ सो मैं भूत ही बन गया....बेचैन मैं भी हूँ और यह बेचैनी भी ऐसी कि किसी तरह ख़त्म ही नहीं होती....क्या करूँ...क्या करूँ....क्या करूँ....जो कुछ हमारे आस-पास घटता है, जिसमें कभी हम कर्ता भी होते हैं...कभी शरीक...कभी गवाह....किसी भी रूप में हमारी जिम्मेवारी...हमारी जवाबदेही ख़त्म नहीं...
रविवार, 11 अप्रैल 2010
चलो धूप से बात करें............
मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!! कभी-कभी यूँ भी हो जाता है कि कोई चीज़ पढ़कर दिल उतावला सा हो जाता है...आज अभी-अभी मेरे साथ ऐसा ही हुआ...कि इक छोटी सी हिंदी ग़ज़ल मैंने पढ़ी और दिल यूँ बाग़-बाग़ हो गया कि गर्मी के मौसम में जैसे इस बाग़ से मीठे-मीठे आम बस गिरने ही वाले हों..इस मीठी-सी ग़ज़ल को पढ़कर नहीं महसूस कर ऐसा ही लगा और अब इसे रज़िया जी की अनुमति के बगैर आपको अपने ब्लॉग पर ही पढवा रहा हूँ....आप दाद दो उनको,मुझे तो ऐसी खुजली हुई कि मैंने दाद-खुजली सब उनको दे डाली है....उनका लिंक और मेल भी साथ ही लिख रहा...
बुधवार, 7 अप्रैल 2010
आसमान तुम्हे देख रहा है !!

मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!ऐय मित्र आसमान तुम्हे देख रहा है गर्दन ऊपर उठाओ,आँखे ऊँची करो ऊपर देखो कि सारा का सारा दिन टकटकी लगाये यह आसमान तुम्हे देख रहा है!!शायद तुम्हे यह तो पता ही होगा कि तुम्हारे होने के बहुत-बहुत-बहुत पहले भी बहुत-बहुत-बहुत कुछ गुजर चूका है आसमान के नीचे,आसमान ने देखी है आसमान के नीचे होने वाली तुम्हारे ईश्वरों की सारी भगवतलीलाएं और तमाम संत-महात्माओं को भी देखा है आसमान ने !!धरती के सभी सिकंदरों के हश्र...
रविवार, 4 अप्रैल 2010
पता नहीं अच्छाई का रास्ता इत्ता लंबा क्यूँ होता है...!!
मैं भूत बोल रहा हूँ..........!! पता नहीं अच्छाई का रास्ता इत्ता लंबा क्यूँ होता है...!! पता नहीं अच्छाई को इतना इम्तहान क्यूँ देना पड़ता है !! पता नहीं सच के रस्ते पर हम रोज क्यूँ हार जाया करते हैं !! पता नहीं कि बेईमानी इतना इठला कर कैसे चला करती है !! पता नहीं अच्छाई की पीठ हमेशा झूकी क्यूँ रहा करती है !! उलटा कान पकड़ने वाले इस जमाने में माहिर क्यूँ हैं !! बात-बात में ताकत की बात क्यूँ चला करती है !! तरीके की बातों पर...
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